रविवार, 31 मार्च 2013

'एक और मृत्यु ''


'एक और मृत्यु ''
-संध्या सिंह
तुम भी तिल तिल मर रहे थे 
और मैं भी ,
तुम भी जीवन ढूंढ रहे थे 
और मैं भी |
सोचा ...
प्रेम के धागे से फटे घाव सियेंगे 
और ....
एक दूजे में जियेंगे 
मगर ....
तुम्हे स्वछंदता चाहिए थी 
मुझे विश्वास ,
मुझे समंदर चाहिए था 
तुम्हे आकाश |
मैं मछली थी 
और तुम परिंदा ,
इस साथ रहने की जिद में 
कोई एक ही रह पाता 
ज़िंदा ........!!!!

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