गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

किसी को दे के दिल कोई नवा संज-ए-फ़ुग़ां क्यों हो (ग़ालिब)



किसी को दे के दिल कोई नवा संज-ए-फ़ुग़ां क्यों हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुंह में ज़ुबां क्यों हो

वफ़ा कैसी कहां का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संगदिल तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यों हो

कफ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियां क्यों हो

ये फ़ितना आदमी की ख़ान:वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आस्मां क्यों हो

निकाला चाहता है काम क्या ता’नों से तू ग़ालिब
तेरे बेमेहर कहने से वो तुझ पर मेहरबां क्यों हो

सदियों से

अरुणा शर्मा


सदियों से
चुपचाप सब 
सहन करती
सबके दर्द को
धरा सी वहन करती,
स्वयं का त्याग कर
समाज को बनाती,
पुरुषवादी समाज में
नारीवादी सोच ढूंढती,
कभी अबला
कभी व्यर्थ सी
हां मैं स्त्री हूं..........

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

जाने क्या कहा

अरुणा शर्मा


जाने क्या कहा
मुझसे इशारों में
तुम्हारी आखों नें,
कोई अनसुलझी
सी पहेली थी
या, मेरा ही
प्रतिबिम्ब था
जो ठहर गया था
तुम्हारी आखों में,
नहीं, मैं नहीं 
जान पाई कभी
क्यॊंकि
तुम सदा ही
नजरे चुरा कर
चले जाते,
और मैं तुम्हारी
आंखों की
गहराई में 
खोजती ही रह जाती
अपने होने का 
अहसास.........

इतनी बड़ी नहीं होनी चाहिए थी पृथ्वी


इतनी बड़ी नहीं होनी चाहिए थी पृथ्वी
कि कोई आंख देख न सके
उसकी समूची गोलाई
किसी पेड़ पर चढ़कर भी

इतनी छोटी भी नहीं 
कि हथेली पर रख ले कोई भी
और उठा ले जाए झोले में भरकर

होती गर तो कुछ यूं कि 
मेरे गांव में मुसहर की लड़की 
जब खोदे कुदाल से चूहे का कोई बिल
तो एक बार मिल जाए उसे बिल गेट्स का देश
या उस देश के छुपाए कुछ हथियार

और शाम को जुटे पूरा गांव
कि ये कैसा तो चूहा है
सूख के कितना कड़ा हो गया है
फिर फेंक दिया जाए उसे नाली में.

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

यह स्याह रात भी

अरुणा शर्मा


यह स्याह रात भी
बीत जायेगी
उन बीती अनेक
रातों की तरह,
कब तक तन्हाईयों
से रहेंगे रुबरु
जाने कब होंगी बातें
बातों की तरह,
क्यूं छाया रहता है
मुझपे सदा
तुम्हारी यादों का
रुमानी अहसास
तेरी खुशबू की तरह,
तुम्हें चाहना नियति
बन गई हमारी,
जैसे चाहा खूदा को
उस फकीर की तरह.......

मरीना समुद्र-तट


अवसाद के क्षणों में लिखी एक कठिन कविता

मरीना समुद्र-तट
(सुलक्षणा के लिए)

वर्षों पहले वे आये थे। एक साथ। साथ रहने के
संकल्प से बँधे। सतर्कता से पहचानने का प्रयास
करते एक-दूसरे की भिन्नताओं को। अभिन्न होने की
सदिच्छा से। 

तब भी यही समुद्र था। इसी तरह
पछाड़ें खाता। हरहराता। व्याकुल। जैसे पटक रहा हो
कोई फणिधर अपना सिर, पृथ्वी को परास्त करने
की विफलता पर खीझ कर।

समुद्र की लहरों भीगी
यही रेत थी जिस पर अंकित किये थे अपने
पद-चिह्न उन्होंने, सोचते हुए कि समुद्र कुछ ही क्षणों
में सप्रयास मिटा देगा उनकी उपस्थिति। ऐसा ही
हुआ। मगर अंकित रहे आये वे पद-चिह्न उनकी
स्मृति में। अधिक स्थायी। लगभग शाश्वत।

एक पंक्ति में चलते हुए वे पद-चिह्न 
कब विलग हुए। कोई नहीं जानता। 
वे स्वयं तो बिलकुल नहीं। शायद यह
उनके भीतर का समुद्र था। क्रुद्ध। लगातार उनके
अन्तरतट पर अपना विक्षुब्ध फन पटकता। व्याकुल
जो सफल हुआ।

अब सान्ध्य बेला में सुदूर समुद्र
तट पर टहलता है एकाकी सहचर। खोजता हुआ
विलीन हुई पद-चिह्नों की वह जोड़ी जो बची नहीं
स्मृति में भी।

मद्रास, मार्च 2000

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

जात -पात में भेद कहाँ


अक्खड़ , फक्कड़ , मस्त कवि है सुरेन्द्र सिंह सुरेन्द्र . उनकी कविता है : 
जात -पात में भेद कहाँ 
अब केवल झूठी शान 
बाबू साहब ने खोली है 
जूते की दूकान 

लौंड्री में लोगों के कपडे 
पंडित जी हैं धोते
छान रहे हैं गरम जलेबी 
लाला जी ( कायस्थ ) के पोते 

शर्मा जी का डेरी फारम 
रखते भैंस पचास 
दूध मिलाते हैं पानी में 
और बने हैं व्यास 

बन कलाल यादव जी बैठे 
रोज कलाली खोले 
रविदास जी कावर लेकर 
हर हर बम बम बोले 

पासवान जी ने टाउन में 
खोली है सैलून 
बिसकरमा के बेटे बेचें 
हल्दी धनिया नून 

वर्ण व्यवस्था टूट चुकी है 
सब हैं एक ही घाट 
जिसके पाले जितना पैसा 
उसकी उतनी ठाट 

फिर झगड़े क्यों जात-पात के 
कुछ सोचो कुछ जानो 
कौन लड़ाता है आपस में 
बूझो और पहचानो ......