गुरुवार, 28 मार्च 2013
अशोक रावत की ग़ज़लें
छोटी छोटी बातों पर दंगा हो जाता है,
जाने बस्तीवालों को भी क्या हो जाता है.
एक माँस का टुकड़ा मिलता है मंदिर के पास,
और हमारी बस्ती में बलवा हो जाता है.
पांच बजे हो जाते हैं घर के दरवाज़े बंद,
सात बजे सड़कों पर सन्नाट्टा हो जाता है.
पावों की जूती हो जाते हैं सारे क़ानून,
राजनीति में कालाधन चंदा हो जाता है.
चौथ बसूलो, हफ़्ता दो,जी भर के मौज करो,
पकड़ा भी जाये तो कोई क्या हो जाता है.
मैं आदर्शों पर चलने की बातें करता हूँ,
मेरा अक्सर लोगों से झगड़ा हो जाता है.
महान विचार बदल जाते हैं
महान विचार बदल जाते हैं
सस्ते चित्रों में
भगत सिंह बदल
जाता है
कार के पिछले शीशे पर चिपकाने
के एक स्टीकर में
उसकी सारी हिम्मत
और प्रेम
बदल दिया जाता है
एक पिस्तौलधारी
लड़के के कलेंडर में
गांधी
बदल जाता है
एक खादी के कुर्ते में
या चरखे में
पद में
या सम्मान दिलाने वाले एक साधन में
जीसस बदल जाता है
एक शानदार चर्च में लगे सोने के
क्रोस में
मुहम्मद
बदल जाता है
बकरे की गर्दन काटने की रस्म में
सदियों का सारा परम्परागत ज्ञान बदल
जाता है
कुछ कर्म कांडों में
मनुष्य के मनुष्य होने के लिये बनाये गये सारे नियम बदल जाते हैं
एक साम्प्रदायिक नाम में
और उसका रोज़मर्रा के जीवन में कोई भी दखल
इस चालाकी से समाप्त कर दिया जाता है
कि इंसान उनसे बच कर फिर से
लालच और जानवराना व्यवहार के साथ जीता रहता है
सारे पर्यावरण और समाज के साथ दुश्मनों की तरह
आपका सारा ज्ञान बदल जाता है
आपको ज्यादा ढोंगी
बनाने में
जिससे आप
अपने
स्वार्थी
और मतलबी व्यवहार को
अपने सभ्य होने के बहाने में
छिपा लेते हैं
आपके चारों तरफ
मेहनत करने वाले जब
भूखे घुमते हैं
और आप
आराम से बैठे बैठे
अमीर बने होते हैं
तब आप बातें करने लगते हैं
मार्क्स की
जिससे
आज और अभी कुछ भी ना करना पड़े
अपनी तो होली
बहुत साल पहले लिखी कुछ पंक्तियां....जब पंजाब में आतंकवाद का दौर चल रहा था, सीमांत क्षेत्र में हुए एक कार्यक्रम में यह रचना सुनाई....आज याद आई तो साझा कर रहा हूं
अपनी तो होली, उसी रोज हो ली
आंखों से लगाई और चुनरी भिगो ली
ना हल्दी का उबटन, ना चन्दन का लेपन
ना रोली ही घोली बस चुपचाप रो ली
कुंवारी उम्मीदें और चिटटे हैं सपने
सूना है आंगन और खाली है झोली
ना गिद्दा ना भंगड़ा ना बोली ही बोली
पिचकारी से निकली अतिवादी की गोली
ना चंग ना रंग ना भंग ही घोला
कराहती गई बस दीवानों की टोली
वर्दी के पहरों में होली की कविता
भीतर जो तोली...तब जा के बोली
अपनी तो होली.....उसी रोज हो ली...
मंगलवार, 26 मार्च 2013
गुजरे वक्त ने धोखा किया
गुजरे वक्त ने धोखा किया हमसे
न मंजिल का पता बताया
न सही रास्ता दिखाया
मगर चलें हैं तो
पहुचेंगे उस मुकाम तक
चाहे जितना भी लंबा हो सफर
आए कितने भी मोड़
रहेंगे राह-ए-गुजर
जिंदगी की आखरी सांस तक
लौट रही हैं लड़कियां
एक एक कर लौट रही हैं लड़कियां
माएं जड़ हैं, पिता मौन
पैसे मुर्दा पड़े हैं
सुरमी गिन रही है
सरदार ने अठारह बार
ईंट भट्टे वाले ने तीन महीने
दिल्ली में साल भर
मृत्युशोक में डूबे हैं घर, जंगल, पहाड़
होली
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
होली पिचकारी
हां इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी।
देखें कैसी है तेरी रंगविरंग पिचकारी।।
तेरी पिचकारी की तकदीद में ऐ गुल हर सुबह।
साथ ले निकले हैं सूरज की किरन पिचकारी।।
जिस पे हो रंग फिशां उसको बना देती है।
सर से ले पांव तलक रश्के चमन पिचकारी।।
बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में।
अभी आ बैठें यहीं बनकर हमतंग पिचकारी।।
हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का नजीर।
पहुंचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी।।
मुझको रंग दो ...
डॉ अ कीर्तिवर्धन
मुझको रंग दो ...
इन्द्रधनुष के रंगों जैसा ,मुझको रंग दो ,
होली के रंगों को ,सतरंगी सा कर दो ।
राग ,द्वेष, बैर भाव, नफरत जड़ से मिटाकर ,
बासन्ती अवसर को खुशियों से भर दो ।
हिन्दू-मुस्लिम की बात नहीं करता यारों,
मानवता जन-जन के जीवन में भर दो ।
धर्म जाति और क्षेत्रवाद की खेल रहे जो होली ,
उन देश के दुश्मनों को ,होली में स्वाहा कर दो ।
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