गुरुवार, 28 मार्च 2013

(Pix: Mughal Emperor Jahangeer enjoying Holi)


Kyon mo par rang ki maari pichkari 
“Why did you spray colour on me?

Dekho Kuarji, doongi main gaari
Look here Kuarji I shall rebuke you sharply! 

Bhaag sakoon main kaise mosu bhaaga nahin jaat
How should I run away, I cannot run;

Thaari ab dekhoon aukoon jo sanmukh aat. 
I stand watching as he approaches

- Babar ki akhiri aulad
(Bahadur Shah Zafar)

(Pix: Mughal Emperor Jahangeer enjoying Holi)

वो कागज़ ही थे



वो कागज़ ही थे
जहां नहीं मारी गई
कोई महिला
दलित
नहीं हुए दंगे
नही हुए घोटाले
नहीं हुआ इंसानियत का
बलात्कार
आप समझ रहे हैं न
कितने अहम हैं कागज़
इस नष्ट होती जाती दुनिया में
इसीलिए कागज़ बचाइए
कागज़ बचेगा तो देश बचेगा

'' अब कैसे कोई गीत बने ''


'' वियोगी होगा पहला कवि ...आह से उपजा होगा गान .''...सुमित्रा नंदन जी की अमर कृति से उपजे कुछ भाव .....

'' अब कैसे कोई गीत बने ''
-------संध्या सिंह



शब्दों का झरना लुप्त हुआ
भावों का दरिया सुप्त हुआ 
जब कलम रेत में ठूंठ हुई 
अब कैसे कोई गीत बने .....

बेचैन करे फिर व्यथा कोई 
रोके ड्योढी पर प्रथा कोई 
या घुटे सांस दीवारों में 
अनकही रहे फिर कथा कोई 

जो कसे बेडियाँ पैरों में 
फिर कट्टर कोई रीत बने 
तब शायद कोई गीत बने ....

फिर पंख परिंदे का टूटे 
या बीच राह मंजिल छूटे
पूरा घट जिसको सौंप दिया 
वो बूँद बूँद जीवन लूटे 

फिर कोई खंडित स्वप्न दिखे 
या एक अधूरी प्रीत बने 
तब शायद कोई गीत बने .....

अशोक रावत की ग़ज़लें




सर झुकाने उसकी चौखट पर मैं रोज़ाना गया,
ये अलग किस्सा है क़ाफ़िर क्यों मुझे माना गया.

अब किसी की फ़िक्र में ये बात शामिल ही नहीं,
नाम जाना भी गया तो किस लिये जाना गया.

जो हमारी जान थी, पहचान थी, ईमान थी,
आज उस तहज़ीब का हा एक पैमना गया. 

क़ातिलों का पक्ष सुन कर ही अदालत उठ गई, 
बेगुनाहों की गवाही को कहाँ माना गया. 

उनकी हाँ में हाँ मिलाना मुझको नामंज़ूर था 
मेरे सीने पर तमंचा इसलिये ताना गया. 

मैं किसी पहचान में आऊँ न आऊँ ग़म नहीं,
मेरी ग़ज़लों को तो दुनिया भर में पहचाना गया.

थोड़ा सा ईमान: अशोक रावत की ग़ज़लें




हमको मंज़ूर था ज़ख़्म खाते रहे,
दोस्तों को मगर आज़माते रहे.

वो बुझाएं दिये उनका ये शौक था,
हम को ये शौक था हम जलाते रहे.

कोई रिश्ता तो तुमने बनाए रखा,
चाहे दुश्मन समझ के निभाते रहे.

हमने ज़ाहिर किये दर्द तो क्या मिला,
तुमने अच्छा किया तुम छुपाते रहे.

आँधियों की नज़र से रहे बेख़बर, 
फूल जब तक रहे मुस्कराते रहे.

वो ग़ज़ल हो गये ये अलग बात है,
दर्द थे हम जिन्हें गुनगुनाते रहे.

(साहिर लुधियानवी)


वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गायेगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की खातिर जुग जुग से हम सब मर मरकर जीते हैं,
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम जहर के प्याले पीते हैं,
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं,
मिटटी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं,
इंसानों की इज्ज़त जब झूठे सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को न बेचा जायेगा,
चाहत को न कुचला जाएगा, गैरत को न बेचा जायेगा,
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनियाँ शरमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर ये भूख के और बेकारी के,
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर दौलत की इज़ारेदारी के,
जब एक अनोखी दुनियाँ की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

मज़बूर बुढ़ापा जब सूनी राहों में धूल न फांकेगा,
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा,
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

फ़ाकों की चिताओं पर जिस दिन इंसां न जलाए जायेंगे,
सीनों के दहकते दोजख में अरमां न जलाए जायेंगे,
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी.

होली की ठिठोली / दुष्यंत कुमार



(ये दोनों ही ग़ज़लें 1975 में ’धर्मयुग’ के होली-अंक में प्रकाशित हुई थीं।)

दुष्यंत कुमार टू धर्मयुग संपादक

पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर ।
संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर ।

अब ज़िंदगी के साथ ज़माना बदल गया, 
पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर ।

कल मयक़दे में चेक दिखाया था आपका, 
वे हँस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर ।

शायर को सौ रुपए तो मिलें जब ग़ज़ल छपे, 
हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर ।

लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप,
शी! होंठ सिल के बैठ गए ,लीजिए हुजूर ।

धर्मयुग सम्पादक टू दुष्यंत कुमार
(धर्मवीर भारती का उत्तर बक़लम दुष्यंत कुमार)

जब आपका ग़ज़ल में हमें ख़त मिला हुज़ूर ।
पढ़ते ही यक-ब-यक ये कलेजा हिला हुज़ूर ।

ये "धर्मयुग" हमारा नहीं सबका पत्र है, 
हम घर के आदमी हैं हमीं से गिला हुज़ूर ।

भोपाल इतना महँगा शहर तो नहीं कोई, 
महँगी का बाँधते हैं हवा में किला हुज़ूर ।

पारिश्रमिक का क्या है बढ़ा देंगे एक दिन,
पर तर्क आपका है बहुत पिलपिला हुज़ूर ।

शायर को भूख ने ही किया है यहाँ अज़ीम, 
हम तो जमा रहे थे यही सिलसिला हुज़ूर ।