शनिवार, 13 अगस्त 2011

फेसबुक

काम वाली बाई
एक दिन अचानक
काम पर नहीं आई
तो पत्नी ने फोन पर डांट लगाईं
अगर तुझे आज नहीं आना था
तो पहले बताना था

वह बोली -
मैंने तो परसों ही
फेसबुक पर लिख दिया था क़ि
एक सप्ताह के लिए गोवा जा रही हूँ
पहले अपडेट रहो
फिर भी पता न चले तो कहो

पत्नी बोली =
तो तू फेसबुक पर भी है
उसने जवाब  दिया -
मै तो बहुत पहले से फेसबुक पर हूँ
साहब मेरे फ्रेंड हैं !

बिलकुल नहीं झिझकते हैं
मेरे प्रत्येक अपडेट पर
बिंदास कमेन्ट लिखते हैं
मेरे इस अपडेट पर
उन्होंने कमेन्ट लिखा
हैप्पी जर्नी, टेक केयर,
आई मिस यू, जल्दी आना
मुझे नहीं भाएगा पत्नी के हाथ का खाना

इतना सुनते ही मुसीबत बढ़ गयी
पत्नी ने फोन बंद किया
और मेरी छाती पर चढ़ गयी
गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोली -
तेरा क्या होगा रे कालिया !
मैंने कहा -देवी !
मैंने तेरे साथ फेरे खाए हैं
वह बोली -
तो अब मेरे हाथ का खाना भी खा !

अचानक दोबारा फोन करके
पत्नी ने काम वाली बाई से
पूछा, घबराये-घबराए
तेरे पास गोवा जाने के लिए
पैसे कहाँ से आये ?

वह बोली- सक्सेना जी के साथ
एलटीसी पर आई हूँ
पिछले साल वर्माजी के साथ
उनकी कामवाली बाई गयी थी
तब मै नई-नई थी
जब मैंने रोते हुए
उन्हें अपनी  जलन का कारण बताया
तब उन्होंने ही समझाया
क़ि वर्माजी की कामवाली बाई के
भाग्य से बिलकुल नहीं जलना
अगले साल दिसम्बर में
मैडम जब मायके जायगी
तब तू मेरे साथ चलना !

पहले लोग कैशबुक खोलते थे
आजकल फेसबुक खोलते हैं
हर कोई फेसबुक में बिजी है
कैशबुक खोलने के लिए कमाना पड़ता है
इसलिए फेसबुक ईजी है

आदमी कंप्यूटर के सामने बैठकर
रात-रातभर जागता है
बिंदास बातें करने के लिए
पराई औरतों के पीछे भागता है

लेकिन इस प्रकरण से
मेरी समझ में यह बात आई है
क़ि जिसे वह बिंदास मॉडल समझ रहा है
वह तो किसी की कामवाली बाई है
जिसने कन्फ्यूज़ करने के लिए
किसी जवान सुन्दर लड़की की फोटो लगाईं है
सारा का सारा मामला लुक पर है
और अब तो मेरा कुत्ता भी फेसबुक पर है     

रविवार, 7 अगस्त 2011

फेसबुक

प्रवीन  राज् गाडिया 
 
काम वाली बाई
एक दिन अचानक
काम पर नहीं आई
तो पत्नी ने फोन पर डांट लगाईं
अगर तुझे आज नहीं आना था
तो पहले बताना था
 
वह बोली -
मैंने तो परसों ही
फेसबुक पर लिख दिया था क़ि
एक सप्ताह के लिए गोवा जा रही हूँ
पहले अपडेट रहो
फिर भी पता न चले तो कहो
 
पत्नी बोली =
तो तू फेसबुक पर भी है
उसने जवाब  दिया -
मै तो बहुत पहले से फेसबुक पर हूँ
साहब मेरे फ्रेंड हैं !
 
बिलकुल नहीं झिझकते हैं
मेरे प्रत्येक अपडेट पर
बिंदास कमेन्ट लिखते हैं
मेरे इस अपडेट पर
उन्होंने कमेन्ट लिखा
हैप्पी जर्नी, टेक केयर,
आई मिस यू, जल्दी आना
मुझे नहीं भाएगा पत्नी के हाथ का खाना
 
इतना सुनते ही मुसीबत बढ़ गयी
पत्नी ने फोन बंद किया
और मेरी छाती पर चढ़ गयी
गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोली -
तेरा क्या होगा रे कालिया !
मैंने कहा -देवी !
मैंने तेरे साथ फेरे खाए हैं
वह बोली -
तो अब मेरे हाथ का खाना भी खा !
 
अचानक दोबारा फोन करके
पत्नी ने काम वाली बाई से
पूछा, घबराये-घबराए
तेरे पास गोवा जाने के लिए
पैसे कहाँ से आये ?
 
वह बोली- सक्सेना जी के साथ
एलटीसी पर आई हूँ
पिछले साल वर्माजी के साथ
उनकी कामवाली बाई गयी थी
तब मै नई-नई थी
जब मैंने रोते हुए
उन्हें अपनी  जलन का कारण बताया
तब उन्होंने ही समझाया
क़ि वर्माजी की कामवाली बाई के
भाग्य से बिलकुल नहीं जलना
अगले साल दिसम्बर में
मैडम जब मायके जायगी
तब तू मेरे साथ चलना !
 
पहले लोग कैशबुक खोलते थे
आजकल फेसबुक खोलते हैं
हर कोई फेसबुक में बिजी है
कैशबुक खोलने के लिए कमाना पड़ता है
इसलिए फेसबुक ईजी है
 
आदमी कंप्यूटर के सामने बैठकर
रात-रातभर जागता है
बिंदास बातें करने के लिए
पराई औरतों के पीछे भागता है
 
लेकिन इस प्रकरण से
मेरी समझ में यह बात आई है
क़ि जिसे वह बिंदास मॉडल समझ रहा है
वह तो किसी की कामवाली बाई है
जिसने कन्फ्यूज़ करने के लिए
किसी जवान सुन्दर लड़की की फोटो लगाईं है
सारा का सारा मामला लुक पर है
और अब तो मेरा कुत्ता भी फेसबुक पर है     

सोमवार, 11 जुलाई 2011

कल ही एक कविता लिखी है भेज रहा हूँ.


                              
                नागार्जुन के नाम

पीयूष पन्त
                          
        ८ जुलाई २०११
शब्द हुए बंधक
           कलम हुई दासी
          जनता में फैली अजब उदासी
         मुट्ठी जब भिंचती है उठने को ऊपर
        त्योरियां तब चढ़ जाती हैं उनकी क्यों कर
       नारे उछलते हैं गगनभेदी
       मानो बजती हो दुन्दुभी जनयुद्ध की 

      होते इशारे फिर कहर है बरपाता
      जनता पर डंडे और गोली बरसाता
     बार- बार लोकतंत्र की कसमें है खाता
     सत्ता के नशे में रहता मदमाता 
     फिर भी वो जनता का नेता कहलाता 

    कैसा ये लोकतंत्र कैसी आज़ादी 
    बोलने समझने की, जहाँ ना हो मुनादी 

                                      

रविवार, 3 जुलाई 2011

यह एक फसाना नहीं..


तमसिल

यह एक फसाना नहीं, 
हकीकत है
अपना एक जहां यहां है
एक वहां है
प्यार पनपता यहां है
और परवान चढ़ता वहां है
जिंदगी कटती यहां है
और रक्स होती वहां है
दिल रहता यहां है
और धड़कता वहां है
सपने दिखते यहां है
और साकार होते वहां है
इरादे बनते यहां है
और मजबूत होते वहां है
गरचे सच कहूं तो तमसिल
इस जहां से उस जहां तक
जद्दोजहद जिंदगी का हर लम्हा है



शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

हर कोई को हक है



तमसिल  

हर कोई को हक है
अपनी जिंदगी जीने
दिल लगाने और मुस्कुराने का
दर्द क्यों उभरता है मेरे सीने का

हर कोई को हक है
अपने फैसले लेने
सपने सजाने और दुनिया बसाने का
हौसला क्यों टूटता है मेरे जीने का

हर कोई को हक है
अपने लिए सोचने
समझने और फिक्र करने का
दिल क्यों करता है जहर पीने का

हर कोई को हक है
अपने हुस्न पे इतराने
खिलखिलाने और गुनगुनानेे का
चैन क्यों खोता है दिन रात का  
           30.06.2011




शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

दूरियां चाहे लाख हो

  तमसिल 

दूरियां चाहे लाख हो
इस रिश्ते की गर्माहट कम न होगी
जुदाई चाहे कितनी भी लम्बी हो
इस प्यार की गहराई कम न होगी
भले ही तुम न हो पास
मगर हर वक़्त
हर पल रहता है
तेरे साथ होने का एहसास
 माना कि हम दूर हैं 
तेरी जुल्फों के साये से महरूम हैं
मगर यादों में रहती हो हरदम
ओ मेरे हमसफ़र मेरे हमदम

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

सरहुल

आलोका
  
मांदर की थाप
हडिया
झूमर
और सरई फूल
आया प्रकृति परब सरहुल
 
सरई का सुगंध
जंगल- जंगल
बोने- बोन
और खेत- खलिहान
सब मस्ती में मग्न
 
उल्लास
भक्ति
और प्रेम  
आस्था के कई  रंग 
प्रकृति के संग
 
शुद्ध हवा के झोंके
रंगबिरंगे फूल
आया प्रकृति परब सरहुल