शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

हीराकुंड का सपना और किसानों का संघर्ष





आलोका रांची झारखण्ड 

तीसरा वि’व युद्ध पानी के लिए होगा। यह भविष्यवाणी बहुत पहले ही हो चुकी है। कई दे’ाों में पानी के लिए मचे हाहाकार से इस भविष्यवाणी की पुष्टि होती है। पानी की समस्या से भारत भी अछूता नहीं है। पानी के लिए दे’ा के कई राज्यों में लडाई शुरू हो चुकी है। उड़ीसा ऐसे ही राज्यों में से एक है। इस राज्य के संबलपुर जिले में पानी के लिए एक द’ाक से जंग छिड़ी हुई है। राज्य सरकार लाख को’िा’ाों के बाद भी इस लड़ाई का हल ढूंढने में नाकाम साबित हो रही है। संबलपुर में पानी के लिए घमसान किसानों और कंपनियों के बीच विगत दस वर्षों से निरंतर जारी है। 
संबलपुर के किसानों ने हीराकुंड डैम के लिए अपनी उपजाऊ जमीन इस उम्मीद से दी थी कि उनकी शेष बचे खेतों तक पानी पहुंचेगा। इससे फसलों का उत्पादन बढ़ेगा और फिर खु’ाहाली का एक नया दौर शुरू होगा। लेकिन कुछ ही वर्षों में किसानों का यह सपना टूट गया। किसानों के लिए पानी की लड़ाई लड़ने वाले रंजन के पांडा बताते हैं कि संबलपुर में हीराकुंड डैम को विकसित करने की योजना दे’ा के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में बनी थी। तब किसानों ने इसका विरोध किया था। किसानों का कहना था कि डैम का विस्तार होने से उन्हें दोहरा नुकसान सहना होगा। डैम के विस्तार में उनकी खेती योग्य जमीन का बड़ा हिस्सा तो जाएगा ही ’ोष जमीन भी डैम के पानी में डूब जाएगा। इसके बावजूद सरकार ने डैम का निर्माण कराया। सरकार का दावा था कि डैम बनने से किसानों को लाभ होगा। उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। डैम के विस्तार के बाद संबलपुर के पूरे इलाके में केनाल के माध्यम से किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाया जाएगा। इससे किसान एक साल में कम से कम दो फसल असानी से उगा पाएंगे। किसान मछली पालन का कारोबार भी बढ़ा पाएंगे। डैम के माध्यम से ही किसानों के लिए बिजली उत्पादन करने की बात भी कही गई। सरकार के इन दावों से किसानों की सोच भी बदल गई। उन्हें लगा कि डैम के विस्तार से उनकी थोड़ी बहुत जमीन भले ही चली जाएगी, लेकिन इसके बाद उनका जीवन खु’ाहाल हो जाएगा। डैम बनने से सिंचाई की समस्या दूर  होगी और विकास का एक नया सफर शुरू होगा। फिर कई द’ाकों के बाद कई चरणों में डैम का निर्माण हुआ। कुछ इलाकों में केनाल बनाकर पानी पहुंचाने का प्रयास भी किया गया। 90 के द’ाक में इसके माध्यम से जिले के कई क्षेत्रों में किसानों के खेतों तक पानी पहंंुचने भी लगा। इससे बहुत हद तक किसानों के हालात भी बदलने लगे। किसान एक ही साल में दो फसल बोने व काटने लगे। इससे उनमें खु’ाहाली भी आने लगी। लेकिन यह सब बहुत दिनों तक नहीं चल पाया। 90 के द’ाक में ही डैम के पानी पर कंपनियों की नजर लग गई। इसके बाद कई कंपनियों ने राज्य सरकार के साथ एमओयू किए और प्लांट लगाए। संबलपुर के किसानों के दुर्दिन यही से शुरू हुए। हीराकुंड डैम के पानी का बंटवारा होने लगा। किसानों को मिलने वाला पानी का एक बड़ा हिस्सा कंपनियों को मिलने लगा। नतीजा यह हुआ कि किसानों के खेतों में पानी कम पड़ने लगा। उत्पादन में कमी होने लगी। डैम का पानी भी प्रदूषित होने लगा। इसका खेती पर प्रतिकूल असर पड़ा। प्रदूषित पानी से किसानों की फसलें खेतों में ही सड़ने लगी। संबलपुर के बूढ़ागढ़ा पंचायत के किसान प्रदीप कुमार प्रधान बताते हैं कि उनके पास पांच एकड जमीन है। दो एकड़ जमीन में डैम के पानी से सिंचाई तो हो जाती है, लेकिन शेष तीन एकड़ जमीन में डैम का पानी पहुंचता ही नहीं है। इसके कारण तीन एकड़ असिंचित भूमि में वे साल में एक ही फसल उगा पाते हैं। जिस दो एकड़ जमीन तक पानी पहुंचता है, उसका पानी भी प्रदूषित रहता है। इससे फसल के उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
इस तरह पानी के बंटवारे से संबलपुर के किसानों के समक्ष एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। जल कर के रूप में एक अच्छी खासी रकम चुकता करने के बाद भी किसानांे के खेतों में पानी के लाले पड़ने लगे। इससे किसान परे’ाान हो उठे और पानी के बंटवारे और प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिए। पिछले एक द’ाक में उन्होंने पानी के बंटवारे के खिलाफ कई बड़े आंदोलन किए। वर्ष 2003 में संबलपुर के किसानों ने पानी के बंटवारे और पानी के प्रदूषण के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन किए। वर्ष 2006 और 07 में भी किसानों ने आंदोलन किए। इस दौरान चासी आंदोलन के तहत जिले भर के लगभग 35 हजार किसान सड़क पर उतर आए और करीब 25 किमी लंबा मानव ऋंखला बनाया। इन आंदोलनों के बाद राज्य सरकार के साथ किसानों की कई बार वार्ता भी हुई। लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकला। आंदोलन का असर सिर्फ यह हुआ कि सरकार के साथ विभिन्न कंपनियों के साथ तेजी से हो रहे एमओयू पर विराम लग गया। चासी आंदोलन के एक नेता देवेंद्र प्रधान कहते हैं कि कई आंदोलनों के बावजूद सरकार ने पानी के बंटवारे पर किसानों के हित में कोई फैसला नहीं लिया। डैम से किसानों को भले ही प्रयाप्त पानी नहीं मिल रहा है, लेकिन कंपनियों को पानी देने में सरकार कोई कोताही नहीं कर रही है। आंदोलन का असर सिर्फ यह हुआ है कि राज्य सरकार ने नई कंपनियों के साथ नए एमओयू करना बंद कर दिया है। 

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