शनिवार, 4 दिसंबर 2010

सांसद नामा -पीयूष पंत


हमने तो तनख्वाह बढ़वा ली,
जनता जाए भाड़ में।
भत्ता, सुविधा भी बढ़वा ली,
जनता जाए भाड़ में।
हम तो रहते मुफ+त मकान में,
जनता जाए भाड़ में।
हम तो करते मुफ+त में यात्रा,
जनता जाए भाड़ में।
बीबी को भी साथ घुमाते,
जनता जाए भाड़ में।
टेलीफोन का बिल नहीं देते,
जनता जाए भाड़ में।
फिर भी हम कहते कम मिलता,
जनता जाए भाड़ में।
हम खा जाएं पशु का चारा,
जनता जाए भाड़ में।
कर डालें टेलिकाॅम घोटाला,
जनता जाए भाड़ में।
हमने जल जंगल बिकवाई,
जनता जाए भाड़ में।
देश सुरक्षा गिरवी रख दी,
जनता जाए भाड़ में।
संसद में करते हंगामा,
जनता जाए भाड़ में।
माइक और कुरसी हम तोड़ें,
जनता जाए भाड़ में।
शून्यकाल चलने नहीं देते,
जनता जाए भाड़ में।
पांच लाख की गाड़ी में घूमें,
जनता जाए भाड़ में।
जे+ड-सुरक्षा में हम चलते,
जनता जाए भाड़ में।
लोकतंत्र की दें दुहाई,
जनता जाए भाड़ में।
नोट तंत्र की महिमा गाएं,
जनता जाए भाड़ में।
हम करवायें राशन की होर्डिंग
जनता जाए भाड़ में।
खूब बढ़ी अब तो मंहगाई,
जनता जाए भाड़ में।
हमने तो अपनी ही सुधाई,
जनता जाए भाड़ में।
अपनी तो कट रही मलाई,
जनता जाए भाड़ में।
-पीयूष पंत

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