शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

हर कोई को हक है



तमसिल  

हर कोई को हक है
अपनी जिंदगी जीने
दिल लगाने और मुस्कुराने का
दर्द क्यों उभरता है मेरे सीने का

हर कोई को हक है
अपने फैसले लेने
सपने सजाने और दुनिया बसाने का
हौसला क्यों टूटता है मेरे जीने का

हर कोई को हक है
अपने लिए सोचने
समझने और फिक्र करने का
दिल क्यों करता है जहर पीने का

हर कोई को हक है
अपने हुस्न पे इतराने
खिलखिलाने और गुनगुनानेे का
चैन क्यों खोता है दिन रात का  
           30.06.2011




शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

दूरियां चाहे लाख हो

  तमसिल 

दूरियां चाहे लाख हो
इस रिश्ते की गर्माहट कम न होगी
जुदाई चाहे कितनी भी लम्बी हो
इस प्यार की गहराई कम न होगी
भले ही तुम न हो पास
मगर हर वक़्त
हर पल रहता है
तेरे साथ होने का एहसास
 माना कि हम दूर हैं 
तेरी जुल्फों के साये से महरूम हैं
मगर यादों में रहती हो हरदम
ओ मेरे हमसफ़र मेरे हमदम

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

सरहुल

आलोका
  
मांदर की थाप
हडिया
झूमर
और सरई फूल
आया प्रकृति परब सरहुल
 
सरई का सुगंध
जंगल- जंगल
बोने- बोन
और खेत- खलिहान
सब मस्ती में मग्न
 
उल्लास
भक्ति
और प्रेम  
आस्था के कई  रंग 
प्रकृति के संग
 
शुद्ध हवा के झोंके
रंगबिरंगे फूल
आया प्रकृति परब सरहुल
 
 
 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

खामोश अंधेरा

खामोश  अंधेरा  
आलोक
आज शहर की रात गहरी है
खामोश अँधेरा  है
रात रुक गई है
लग रहा है
कल का सूरज
आश्मान में आयगा भी की नहीं
उस घर जहा
कल तक सपने बुने जाते थे
जहाँ
आज सपने लुटते हुए देखा  है
वर्सो लग गए थे
आसियान  बने में
पल में मिटटी में
बदल दिया
उनके जहा को
आज उनके जहा
अँधेरा है
कल का सपना
बदल गया है
पल में आपने
बेगाने हो गए है


गुरुवार, 24 मार्च 2011

शहादत

डा0 खगेन्द्र ठाकूर
 
मैं उभी जिस मूर्ति के पास खड़ा हूं।
वह एक  शहीद की  है,
मैं उसे सहला रहा हूंँ
बहुत अच्छा लग रहा है।
बहुत ही जीवन्त मूर्ति है।
कलाकार ने उडेल दी है।
अपनी सारी कला
इसे जीवन्त बनाने में
तभी अचानक मेरे मन में
यह विचार आया कि
यदि अचानक दौड़ने खून उनकी नसो से
और वह मेरा हाथ पकड़ ले
और कहे- कामरेड
चलो यही समय है कूच करने का
तो मैं क्या करूँगा?
यह विचार मन में आते है
मैं वहां सरपअ
भाग खड़ा हुआ।

रविवार, 20 मार्च 2011

उम्मीद के पालू में रिश्ते

उम्मीद के पालू में रिश्ते 
 एक रिश्ता हर कोई के पास है.
हर के पास एक आशा 
उम्मीद हर के पास 
बंधे है पालू में 




शनिवार, 19 मार्च 2011

तुम्हारे शहर

 mirchi
तुम्हारे शहर का मौसम
बड़ा सुहाना लगने लगा
सुबह के घुप की कोमलता
बड़ा सुहाना होता है।
दिन की रौशनी में
तपते-तड़पते अच्छा लगे
नहीं संभव है तुम्हे भुलाना
तुम्हे भुलाने में हमें जमाना लगे।
बुरा न मानों
तो शाम थोड़ा चुरा ले
न जाने तुम
इतना जिन्दगी से बेबस
क्यों लगे
इतना जिन्दगी से
अगर वेबस न होतो
तेरे शहर से
थोड़ा छण दिल लगी
कर आए