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रविवार, 20 मार्च 2011

उम्मीद के पालू में रिश्ते

उम्मीद के पालू में रिश्ते 
 एक रिश्ता हर कोई के पास है.
हर के पास एक आशा 
उम्मीद हर के पास 
बंधे है पालू में 




शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

एचबी रोड से कल्बरोड तक (अलोका)

एचबी रोड से कल्बरोड तक
उस वक्त तक हम
अकेले- अकेले थे
अलग- अलग बटे थे।
अपनी व्यथा
दूर जाकर
उसके मंच में कहते थे।
उस वक्त तक हम
अकेले- अकेले ही थे।
अलग- अलग
वि’ाय,
वि”व,
विकास के लिए
बस एक वक्त तक
एक विचार
फिर................

उस वक्त तक हम
अकेले थे।
अलग- अलग
माटी- पार्टी और अपना राज्य
एक सपना
सब देखते रहें............................

उस वक्त तक हम
अकेले थे।
अलग- अलग

उसकी ही मंच से
अलग राज्य के संघर्’ा के लिए
आवाज लगायी हमने
भूखें रहकर कसमें खाई हमनें।
वो वक्त आया
जब हमनें
मिलकर संघर्’ा के रास्ते को
चुनौती पूर्ण बनाया
विकास”ाील और विकसित दे”ा को
चुनौतियों से ललकारा
अपना अ”िायाना बनाया
एचबी रोड से कल्ब रोड तक

झारखण्ड में सामूहिक जीविन
और
आंदोलन में
औरतो लडकियों का योगदान
पहचान का सवाल
रोजगार का सवाल
जल- जंगल- जमीन का सवाल
निरंतर सोचने लगे थें
कल्ब रोड से एचबी रोड़ तक

निरंतर सोच ने जन्म दिया
कोयलकारेां का आंदोलन
नेतरहाट फिल्डिग फाइरिंग रेज
में नगाड़े की गुंज ने
पूरें वि”व में विस्थापन और विकास के बीच
एक सवाल खड़ा कर दिया
मानव अस्तित्व का सवाल
फिर उठता ही गया
सवाल दर सवाल
सवालो के बीच
संघर्’ा जारी रहा
जंजीरों को तोड़ा
मुक्त हुआ झारखण्ड
हमने जीत ली एक आजादी
दे”ाज जनता और दे”ाज विकास की

लेकिन ये क्या?
दे”ाज के सर पर दिकू ...........!
इधर लूट उधर लूट
अंतर मिट गया

हमारी जमीन हमारा गांव
हमारी संस्कृति, हमारा जंगल,
हमारे प”ाु-पक्षी
सब लूट के ले जा रहें है।

छिन्नता जा रहा है
हमारा सब कुछ
आज हम फिर
अकेले- अकेले
अलग- अलग क्यों?
क्या खत्म हो गये?
विकास और विना”ा के सवाल
पूंजी और पानी के सवाल
पक्षी और पूर्वज के सवाल

तब पसरें हुए सन्नाटे के बीच
अलग- अलग
अकेले- अकेले क्यों है।
कल्ब रोड़ से एचबीरोड तक




शनिवार, 13 दिसंबर 2008

नेता


Prem prakash ( Daltengunj)


जिसकी खादी धोती
कुर्ता व टोपी सफेदी इसकी बढ़ाए ’ाान
यही है नेता की पहचान
जिसका
जूता काला
च’मा काला
साथ ही साथ
कर्म भी काला
काले रंग मेें एसकी जान
यही है नेता की पहचान
हर दम दिखता
जिसको
‘‘ कुर्सी’’
जाप करना कुर्सी का
कुर्सी की खतिर लुटवाए हजारों की जान
यही है नतेा की पहचान।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

दामिन-इ-कोह की।

दामिन-इ-कोह की।
जीवन एक सुत्र में बंधा था ।
भूल जाऐगे- जंगत के र्दद
बन कर रहेगें राजा-रानी
जंगल के साथ।
कंठ से निकलते मधुर गीत।
स्वपन सुखी समृद्ध समाज का
दिनचर्या होती शुरू।
मुर्गी की बांग से।
जंगल में पैर ना रखा हो इंसान
हुआ था तैयार घने जंगल में
घास- पूस,दीवारो का छोटा सा
गाव संथाल का।
रंग -बिरगी जंगली जानकरों
फूलो तितली के चित्र।
मेहनत खुले आसमान के नीचे
कंद मूल इकट्ठ कर।
शाम को घर को लौटते।
जो मिला खाकर भूख शांत करते।
शुरू होता समूह में गाना, बजाना।
फिर आराम।
कहां गया?
दामिन-इ-कोह के अपना राज।

मूढ़ी का पाइला।

लगती है अच्छी
मूढ़ी वाली
चार पाइला मूढ़ी के बाद
भरी पोलोथिन मूढ़ी में
उपर से डाल देती है
एक मूट्ठी मूढ़ी
हालाकि यह चगनी मंगनी है
कि चार पाइला
मूढ़ी में थोड़ा हिल जाने पर
कुछ मूढि.यां गिर जाती है
ऐसा नही है
पाइला का माप कम हो जाता
फिर भी वो डाल देती है
उस पोलोथिन में मुट्ठी भर मूढ़ी
जैसे विवाह के बाद
बेटी की विदाई के वक्त
मां मुट्ठी भी चावल, हल्दी और दूब
खेाइछा देती है बांध
यह थोडा सा नहीे होता हैंइसमे
प्यार आत्मीयता
गर्माहट और
‘’ाुभकामनाओं का
अनन्त संसार होता है
मुट्ठी भर प्यार
मुट्ठी भर गर्माहट
बस अब
मुट्ठी भर अच्छे लोग।
खजूर की चटाई।
नानी के गांव में
खजूर क पत्ते
और उसकी चटाई
आज जीवित है
सदियों के बाद सर्दियों में
ओढ़ने बिछाने के लिए
मेहमानों के स्वगत के लिए
सम्मान पूर्व बैठने के लिए
आंधी तूफान में खोजते खजूर की चट्टाई
बरसात की झड़ी में
ढ़कने के लिए है मात्र
खजूर की चटाई।
चटाई हर किसी के पास
खलिहान में बैठने की इच्छा
चटाई मिट्टी के उपर डाल
इतमिनान से बुढ़ी औरतें
जीवन को गाते- सुनाते
खजूर के पेड के पत्ते से अनुभव
शहर वापस आते वक्त
चटाई की सुगन्ध
महसूस करते है हम
खजूर की चट्टाई
दिसंबर की रात
जाड़े के साथ
नानी पास होती
खजूर की चटाई
ढ़क कर हमें सुलाती
कंप कपी के ठंड़
बढ़ता था रातों कों
चूल्हे पर लकड़ी
जला कर ठंड से
लडाई,
साथ में खजूर की चट्टाई
आंधी रात को
गांव के सब लोगों ने
खजूर की पत्ती के साथ
जीवन जीना सीख लिया था।
जब मै बड़ी हो गयी
याद करते है।
अपने नानी घर कि कथा
महसूस करते
उस गांव के मुगी- मुर्गी।

पक्षी और घास के दिन
बेल आम कि महक याद आती है।
याद आती है खजूर की चटइ


प्राकृति
प्राकृति से लगाव।
इसका अर्थ दुसरा है।
मैं प्राकृति के धुन
और गीत सुनती हूं।
झरने चलते जाते हैं।
छोडते जाते है शब्द ।
तान होती उसमें
गुजरते है जहां से
वातावरण जाता है।
बदल-बदल सा
हर मोड पर
सभी के लिए।
धुन और तान एक समान है।
हवा भी साथ में
तान मिलाती है
मानों पत्थर पर टकरा कर नये
सुर ताल बिखेर रहे हो।
लगता है मांदल पर
किसी ने कम्पन्न
पैदा कर दी हो।
पक्षी भी अपने
स्वर रोक नही पाते।
हर कोई की अपनी वाणी।
पिरोये होते सुर में ।
वृक्ष भी इस तान से
दुर नही रह पाता ।
मानों समूह के साथ
अपना स्वर मिला रहा
झिंगूर(कीडे+) भी धरती के
अन्दर स्वर मिलाते है।
जब पूरी वादी एक साथ
झुमर गीत का तान छेड चुका हो
हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज
वहां करा जाते है
यह भी एक युद्ध जैसा ही है।
वे अपने गीतों के माघ्यम से
एकता का ऐलान कर रहा।