प्रेम प्रकाsh
सावन में तुम तो
आये सजना
पर सावन में
आया नहीं सावन
ला£ों का सावन
मनभावन सावन
फूलों से
गायब है सावन
बागों से
गायब है सावन
गीतों से
गायब है सावन
£ेतों से
गायब है सावन
सावन मे
ं
बिन सावन
कैसे गायें
कजरी सावन
मनभावन सावन
लुभावन सावन
किसने चुराया
ये सावन
कहाॅ छुपाया
ये सावन
जाओ.........!
जाओ.........!
मेरे साजन
ढ़ुॅढ़ के लाओ
ये सावन
छीन के लाओ
ये सावन
मनभावन सावन
लुभावन सावन
प्रेम प्रकाsh
रविवार, 29 अगस्त 2010
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
जवां होती हसीं लड़कियां
शाहिद अख्तर
जवां होती हसीं लड़कियां
जवां होती हसीं लड़कियां
दिल के चरखे पर
ख्वाब बुनती हैं
हसीं सुलगते हुए ख्वाब !
तब आरिज़ गुलगूं होता है
हुस्न के तलबगार होते हैं
आंखों से मस्ती छलकती है
अलसाई सी खुद में खोई रहती हैं
गुनगुनाती हैं हर वक्त
जवां होती हसीं लड़कियां...
वक्त गुजरता है
चोर निगाहें अब भी टटोलती हैं।
जवानी की दहलीज लांघते उसके जिस्मो तन
अब ख्वाब तार-तार होते हैं ।
आंखें काटती हैं इंतजार की घडि़यां।
दिल की बस्ती वीरान होती है
और आंखों में सैलाब।
रुखसार पर ढलकता है
सदियों का इंतजार।
जवानी खोती हसीं लड़कियां...
जवां होती हसीं लड़कियां
काटती रह जाती हैं
दिल के चरखे पर
हसीं सपनों का फरेब ।
जवां होती हसीं लड़कियों के लिए
उनके हसीं सपनों के लिए
हसीं सब्ज पत्ते
दरकार होते हैं। - शाहिद अख्तर
जवां होती हसीं लड़कियां
जवां होती हसीं लड़कियां
दिल के चरखे पर
ख्वाब बुनती हैं
हसीं सुलगते हुए ख्वाब !
तब आरिज़ गुलगूं होता है
हुस्न के तलबगार होते हैं
आंखों से मस्ती छलकती है
अलसाई सी खुद में खोई रहती हैं
गुनगुनाती हैं हर वक्त
जवां होती हसीं लड़कियां...
वक्त गुजरता है
चोर निगाहें अब भी टटोलती हैं।
जवानी की दहलीज लांघते उसके जिस्मो तन
अब ख्वाब तार-तार होते हैं ।
आंखें काटती हैं इंतजार की घडि़यां।
दिल की बस्ती वीरान होती है
और आंखों में सैलाब।
रुखसार पर ढलकता है
सदियों का इंतजार।
जवानी खोती हसीं लड़कियां...
जवां होती हसीं लड़कियां
काटती रह जाती हैं
दिल के चरखे पर
हसीं सपनों का फरेब ।
जवां होती हसीं लड़कियों के लिए
उनके हसीं सपनों के लिए
हसीं सब्ज पत्ते
दरकार होते हैं। - शाहिद अख्तर
शनिवार, 14 अगस्त 2010
भारत माता की जय बोलो
भारत माता की जय बोलो
अलोका
चाहे भूखे हो, चाहे नंगे
भारत माता की जय बोलो
बेरोजगारी हो, भुखमरी
जय की जय जय हो
भूखे पेट हो
बीमार, लाचार,
पूरी व्वस्था,
समानता की लड़ाई लड़,
जर से जमीं तक कर रहा
मिला हमें सिर्फ
भूख गरीबी, बेरोजगारी,
भूखा नंगा भारत
जय बोलो भारत माता की
अलोका
चाहे भूखे हो, चाहे नंगे
भारत माता की जय बोलो
बेरोजगारी हो, भुखमरी
जय की जय जय हो
भूखे पेट हो
बीमार, लाचार,
पूरी व्वस्था,
समानता की लड़ाई लड़,
जर से जमीं तक कर रहा
मिला हमें सिर्फ
भूख गरीबी, बेरोजगारी,
भूखा नंगा भारत
जय बोलो भारत माता की
जनता के नाम
-पीयूष पंत
मना लो तुम आजदी, फहरा लो तिरंगा
कौन जाने कल, अब क्या होगा,
जिस तरह हमारी अभिव्यक्ति पर
पहरा लगाया जा रहा है,
देश की गरिमा और अस्मिता को
विश्व बैंक के हाथों
नीलाम किया जा रहा है,
‘विकास’ के नाम पर गरीबों, मजदूरों
और किसानों का आशियाना
उजाड़ा जा रहा है,
और जाति-धर्म के नाम पर कौम को
आपस में लड़ाया जा रहा है,
उठो कि अब थाम लो हाथ में मशाल तुम!
बचा लो, बचा लो तिरंगे की ‘आन’ तुम!!
मना लो तुम आजदी, फहरा लो तिरंगा
कौन जाने कल, अब क्या होगा,
जिस तरह हमारी अभिव्यक्ति पर
पहरा लगाया जा रहा है,
देश की गरिमा और अस्मिता को
विश्व बैंक के हाथों
नीलाम किया जा रहा है,
‘विकास’ के नाम पर गरीबों, मजदूरों
और किसानों का आशियाना
उजाड़ा जा रहा है,
और जाति-धर्म के नाम पर कौम को
आपस में लड़ाया जा रहा है,
उठो कि अब थाम लो हाथ में मशाल तुम!
बचा लो, बचा लो तिरंगे की ‘आन’ तुम!!
सोमवार, 26 जुलाई 2010
प्रियतम
इतवा मुंडा
शादी के रास्ते में बिछड़ गये
कमर हिला के चली थे तुम
बेनी गांठे हुए चमक रही थी
देखकर मोहित हुवा प्रियतम
मेरा मन तुमको पसंद किया
दिल के अन्दर खुशिया भर आई
मेरे चरणों को तुम धोई
जीवन साथी बनाने के लिए पर
मुर्गे की तरह प्रियतम तुमने
लात मर कर भगा दिए हमे
,
सीने के अन्दर मेरा प्राण जा रहा है
,
हमने लेबेद गांव गए थे, तो ,
तुम लकड़ी लेन के बहाने जंगल गई
प्यारी माँ ने मरे
पांव को धोये
सीने के अन्दर मेरे प्राण उड़ गया,
तुम्हे रत में सपनी में देखता हु,
दिन में तेरी याद में डूबा रहता हु,
खाना पीना छोड़ दिया हु,
पागल की तरह घूम रहा हु,
शादी के रास्ते में बिछड़ गये
कमर हिला के चली थे तुम
बेनी गांठे हुए चमक रही थी
देखकर मोहित हुवा प्रियतम
मेरा मन तुमको पसंद किया
दिल के अन्दर खुशिया भर आई
मेरे चरणों को तुम धोई
जीवन साथी बनाने के लिए पर
मुर्गे की तरह प्रियतम तुमने
लात मर कर भगा दिए हमे
,
सीने के अन्दर मेरा प्राण जा रहा है
,
हमने लेबेद गांव गए थे, तो ,
तुम लकड़ी लेन के बहाने जंगल गई
प्यारी माँ ने मरे
पांव को धोये
सीने के अन्दर मेरे प्राण उड़ गया,
तुम्हे रत में सपनी में देखता हु,
दिन में तेरी याद में डूबा रहता हु,
खाना पीना छोड़ दिया हु,
पागल की तरह घूम रहा हु,
.हमारा राज्य अति सुन्दर
एतवा मुण्डा गरूडपिडी
हमारा गांव - हमारा राज्य अति सुन्दर
स्वर्ण से भी दुगुणा,
ळमसब नहीं छोड़ेगे,
ज्ीवन के अंतिम संासां तक लडेंगे, पर
ळमलोग नहीं छोंडेे+गे।
ळमारे यहां सोना चांदी
लोहा, कोयला खनिलों का भण्डार है,
ळमलोग नहीं छोड़ेंगे।
काम@ काज मेहनत से करेंगे
हम सब नहीं छोडे+ंगे।
नदी के तराईयों मं सुन्दर खेत
सोना रूपा की भांति नृत्य आखाड़ा
हमलोग नहीं छोड़ेगे,
जंगल पहाड़ों से सभायमान है
हम नहीं छोडें+गे।
जबतक चांद सूरज रहेगा,
हमारी लड़ाई चलता रहेगा,
हमलोग नहीं छोड़ेगे।
जीविन के अंतिम सांसो तक लड़ेगे।
हम लोग नहीं छोड़ेगे।
हमारा गांव - हमारा राज्य अति सुन्दर
स्वर्ण से भी दुगुणा,
ळमसब नहीं छोड़ेगे,
ज्ीवन के अंतिम संासां तक लडेंगे, पर
ळमलोग नहीं छोंडेे+गे।
ळमारे यहां सोना चांदी
लोहा, कोयला खनिलों का भण्डार है,
ळमलोग नहीं छोड़ेंगे।
काम@ काज मेहनत से करेंगे
हम सब नहीं छोडे+ंगे।
नदी के तराईयों मं सुन्दर खेत
सोना रूपा की भांति नृत्य आखाड़ा
हमलोग नहीं छोड़ेगे,
जंगल पहाड़ों से सभायमान है
हम नहीं छोडें+गे।
जबतक चांद सूरज रहेगा,
हमारी लड़ाई चलता रहेगा,
हमलोग नहीं छोड़ेगे।
जीविन के अंतिम सांसो तक लड़ेगे।
हम लोग नहीं छोड़ेगे।
शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
अभी तो
रणेन्द्र
शब्द सहेजने की कला
अर्थ की चमक, ध्वनि का सौन्दर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन
जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार
जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछूए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ
अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगन्त
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता
अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौन्दर्य सहजने
और बरतने की अद्भुत दमक से
चैंधियायी हुई हैं हमारी आँखें
अभी तो,
राजधानी के लाल सूर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं
अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है
अभी तो,
राजपरिवारों और सुख्यात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की बर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े हांेठ टहटह हो रहे हैं
अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारांे-हजार द्रौपदी संताल हैं
अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है
अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिबाईयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है
अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदे लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी
अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहू का सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हे शिशु तो हुलस सकें
लेकिन सौन्दर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही
अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सी0के0 जानू, सत्यभामा शउरा
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ..... और .....
गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ
अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ
शब्द सहेजने की कला
अर्थ की चमक, ध्वनि का सौन्दर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन
जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार
जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछूए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ
अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगन्त
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता
अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौन्दर्य सहजने
और बरतने की अद्भुत दमक से
चैंधियायी हुई हैं हमारी आँखें
अभी तो,
राजधानी के लाल सूर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं
अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है
अभी तो,
राजपरिवारों और सुख्यात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की बर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े हांेठ टहटह हो रहे हैं
अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारांे-हजार द्रौपदी संताल हैं
अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है
अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिबाईयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है
अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदे लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी
अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहू का सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हे शिशु तो हुलस सकें
लेकिन सौन्दर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही
अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सी0के0 जानू, सत्यभामा शउरा
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ..... और .....
गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ
अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ
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