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शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

झारखण्डी के आंखों से

अलोका 
झारखण्डी के आंखों से 
मै देखा हुं दर्द रे
विकास दूर नजर आए,
बड़ी दूर नजर आए
जब बैठी उनके साथ
मन में उसके सपने आए
एक गांव था सबके
ओ अब खोने लगा है।
वोट देकर
हाय सब कुछ लुटने लगा है।
इस सरकार के भरोसे पे
सब सूखने लगा है।
भूल के जब गांव रे
जाती हूं देखने
मर मर के जी रहे हैं।
लुट रहे जमीन जंगल को
दिन रात दुआ मांगे
आदिवासी सबके वास्ते
कभी अपनी उम्मोदांे का
फूल न मुरझाए
झारखण्ड जब से सरकार के
 रंगों मों रंगा है।
गांव गांव में जनता रोने लगी है।
सबके प्यार भरे सपने
कहीं ये व्यवस्था छिन न ले
मन दुखी हो जाए

बुधवार, 29 सितंबर 2010

किरण

MIRCHI RANCHI

रिक्तम किरण से ज्यादा
छुती है मुझको तेरी आवाज
ळवा से ज्यादा स्र्प”ा
क्रती है तेरी “ाब्द
प्रेम से ज्यदा
.तेरे पास होने का
एहसास है मुझकों
.अपने हदय से ज्यादा
.तेरे भावनाओं का ख्याल है मुझे
चलते हो दूर कहीं
आहट् सुनाती है मुझे
पास होने पर
दुनिया से बेखबर होती हुं मैं
हर मुलाकात के बाद
खत्म नहीं होती इंतजार
आपकी
क”ती भरती संासों में
वहां तक छुं आने की तमन्ना है मेरी
वफा न किया
वेबफाई न हुई
दुर तलक संचार से
भावना को छुआ तुनें
यह उमंग थी या तन्हाई
छोनो को एहसास ही नहीं

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

गुहामानव के भित्तिचित्र

रणेन्द्र
क्या ढूढ़ना चाहता हूँ इनमें
कौन सी नवीनता, अनूठापन
उन्होंने सिर्फ शिल्प बदले हैं
कथ्य नहीं बदले,

पूरी दुनिया के गुफा-भित्तिचित्रों के
पैटर्न एक से हैं
रेखांकनों में अनोखी एकरूपता

हथियार, शिकार
और उनकी घेराबन्दी,
काँधे लटके, रक्तसने शिकार

पर कहीं नहीं
टपके रक्त के दाग
न कोई आह! ना चीत्कार
इतिहास, शिकारियों की ही रचना है,

देश और काल
इन्हीं गुफाओं में कर रहे कदमताल,

फर्क सिर्फ इतना कि
गुहामानवों ने चमचमाती संज्ञाओं के
टाँग लिए टैग
कमर के वल्कल, मृगछाल के ऊपर
वर्दियाँ, पतलून, जिन्स, सुट, अगड़म-बगड़म
ड्रेस डिजाइनिंग नई संज्ञा है शायद
कि विशेषण, कि प्रदर्शन, कि छलावा,

दरअसल अँधेरी गुफा ही शाश्वत है
शाश्वत हैं, रक्तसने, काँधे लटके शिकार,

देश-काल के साथ
कदमताल करता गुहामानव
चतुर, होशियार
देता रहा हथियारों पर धार
उन पर चढ़ाता रहा
शहद के लेप पर लेप
गढ़ता रहा नये-नये टैग
पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, आधुनिकता,

दरअसल, ये अँधेरी गुफाओें को
दिमाग की सुराख में
छुपाने की तरकीबें थीं

गैर कबिलाई, गन्दे गुलाम, घटिया नस्लें, छोटी जातियाँ,
बागी, विधर्मी, विद्रोही, नक्सली, सारी की सारी स्त्रियाँ
शिकारों की लम्बी होती गर्इं सूचियाँ

हाँका और घेरे के सात्विक सिद्धान्त
कब के स्थापित हो चुके


राज्य, धर्म, समाज, परिवार
सुविधा और हिस्सानुसार
भरपूर शिकार के लिए गढे+ गए
छोटे-बड़े घेरे हैं,

खून की धार जो बहती रही
सभ्यता नाम का खुजलाहा कुŸाा
आक्षितिज जिह्वा फैला, चाटता रहा
और संस्कृति
उसी की संगिनी
हड्डियों के ढ़ेर को चबा-चबा
धूल बनाती रही,

खाकी शिकारियों के काँधे की
काठ पर लटकी
बागी स्त्री की लाश,
शिकार के इस नये चित्र पर
अलग से कुछ नहीं कहना

माँ धरती की गोद में
कहीं कोई निष्कंटक कोना नहीं शेष

बस शेष है
धुँधला सा एक स्वप्न
तीलियाँ इक्कट्ठा करने की चाह।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

भारत माता की जय बोलो

भारत माता की जय बोलो
अलोका
चाहे भूखे हो, चाहे नंगे
भारत माता की जय बोलो
बेरोजगारी हो, भुखमरी
जय की जय जय हो
भूखे पेट हो
बीमार, लाचार,
पूरी व्वस्था,
समानता की लड़ाई लड़,
जर से जमीं तक कर रहा
मिला हमें सिर्फ
भूख गरीबी, बेरोजगारी,
भूखा नंगा भारत
जय बोलो भारत माता की



सोमवार, 26 जुलाई 2010

प्रियतम

इतवा मुंडा

शादी के रास्ते में बिछड़ गये

कमर हिला के चली थे तुम

बेनी गांठे हुए चमक रही थी

देखकर मोहित हुवा प्रियतम

मेरा मन तुमको पसंद किया

दिल के अन्दर खुशिया भर आई

मेरे चरणों को तुम धोई

जीवन साथी बनाने के लिए पर

मुर्गे की तरह प्रियतम तुमने

लात मर कर भगा दिए हमे
,

सीने के अन्दर मेरा प्राण जा रहा है
,

हमने लेबेद गांव गए थे, तो ,

तुम लकड़ी लेन के बहाने जंगल गई

प्यारी माँ ने मरे
पांव को धोये

सीने के अन्दर मेरे प्राण उड़ गया,

तुम्हे रत में सपनी में देखता हु,

दिन में तेरी याद में डूबा रहता हु,

खाना पीना छोड़ दिया हु,

पागल की तरह घूम रहा हु,

.हमारा राज्य अति सुन्दर

एतवा मुण्डा गरूडपिडी
मारा गांव - हमारा राज्य अति सुन्दर
स्वर्ण से भी दुगुणा,
ळमसब नहीं छोड़ेगे,
ज्ीवन के अंतिम संासां तक लडेंगे, पर
ळमलोग नहीं छोंडेे+गे।
ळमारे यहां सोना चांदी
लोहा, कोयला खनिलों का भण्डार है,
ळमलोग नहीं छोड़ेंगे।
काम@ काज मेहनत से करेंगे
हम सब नहीं छोडे+ंगे।
नदी के तराईयों मं सुन्दर खेत
सोना रूपा की भांति नृत्य आखाड़ा
हमलोग नहीं छोड़ेगे,
जंगल पहाड़ों से सभायमान है
हम नहीं छोडें+गे।
जबतक चांद सूरज रहेगा,
हमारी लड़ाई चलता रहेगा,
हमलोग नहीं छोड़ेगे।
जीविन के अंतिम सांसो तक लड़ेगे।
हम लोग नहीं छोड़ेगे।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

अभी तो

 रणेन्द्र

शब्द सहेजने की कला
अर्थ की चमक, ध्वनि का सौन्दर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन

जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार

जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछूए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ

अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगन्त
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता

अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौन्दर्य सहजने
और बरतने की अद्भुत दमक से
चैंधियायी हुई हैं हमारी आँखें

अभी तो,
राजधानी के लाल सूर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं

अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है

अभी तो,
राजपरिवारों और सुख्यात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की बर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े हांेठ टहटह हो रहे हैं

अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारांे-हजार द्रौपदी संताल हैं
अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है

अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिबाईयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है

अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदे लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी

अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहू का सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हे शिशु तो हुलस सकें

लेकिन सौन्दर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही

अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सी0के0 जानू, सत्यभामा शउरा
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ..... और .....

गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ

अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ

बुधवार, 8 जुलाई 2009

सांवरी-1

रणेन्द्र

जानता हूँ तुम
रजतपट से बाहर आई
नन्दिता दास, रेखा, स्मिता
नहीं हो,
न ही
महाकाव्यों के पन्नों से छिटकी,
द्रौपदी-कृष्णा हो,
न मत्स्यगन्धा, न तिलोत्तमा ।
पर
तुम कौन हो ?
स्वर्णमृगी !
जिसकी एक झलक पा
व्यग्र हो गई हैं
सीता सी
मेरी कोरी कामनाएँ !

मुझे मालूम नहीं
मेरी निगाहें
राम सी
धनुर्धारी हैं या नहीं
किन्तु
अभी तो
यह भी तय नहीं
कि कौन व्याध है
और कौन शिकार

कि लोगों ने
यह निर्णय दे दिया
कि हमने
लक्ष्मण रेखा लांघी है
अब अभिशाप है
और हम हैं
काली रात सा कलंक है
हमारे माथे पर
दिठौने-सा .............




सांवरी-2

समुद्र मंथन की कथा,
विवरण और विस्तार से
नहीं मैं सुपरिचित
अमृत - कलश
देव - दानव संघर्ष
विष्णु-मोहिनी रूप का
नहीं मैं गवाह
किन्तु
पुराणकारों ने जिसे छुपाया,
न गाया गीत
जिसका कवियों ने
समुद्र-मंथन से ही निकली
वह अमूल्य निधि
तेरे चेहरे का नमक
........................
जिसका मैं गवाह हूँ
रणेन्द्र
जिसे
देव वरूण ने
स्वयं अँजुरी भर-भर
न्यौछावर किया
तुम पर
तुम्हारे जामुनी रंग पर
और स्वयं ही धन्य हुए
तुम्हारी निगाहों से
नाक की तीखी कोर से
पसीने की बूँद से बिखरता
नमक का एक कण
शत-शत अमृत कलशों पर
भारी है
हे साँवरी !

सांवरी-3

रणेन्द्र

देह है
या देह नहीं है
शाश्वत प्रश्न यह कि
सिर्फ रूह है -
खुशबू भरी
कि देह भी है
देह तो घर भी है
बिस्तर भी
स्पंदनहीन, आवेगहीन
कामनाओं-सी रीती
सिर्फ आदत
और ऊब.....................
मानो एक मुठ्ठी रेत
रोज गिरती हो
रूह पर...................जिसकी खुशबू
युगों पूर्व
गुम हो गई हो
कपूर सी ।
सच कहूँ तो
तुम अश्विनीकुमारों की
वरदान हो
मेरी द्वितीया !
(या अद्वितीया !)
तुम्हारे
लावण्य के एक परस ने
मनो-मन
रेत गला दी है
कालचक्र को उलट
संभव किया है
किशोर हो जाना
मेरे मन का
पुनर्नव !
कि जैसे
अपनी ही राख से
फिर जाग गया हो
ककनूस पंछी
इच्छाओं की उत्ताल-
लहरों को
सीने में समोए
वृन्त पर इकलौते
पीपल पत्ते सा थरथराता
नेह-आतुर, स्पर्श-कातर
तुम्हारी देह की चाँदनी में
बिछल-बिछल जाता
यह चिर किशोर
तुम्हारा आभारी है
मेरी उर्वशी !
+ऋषि श्वेतकेतु के
इस छतनार गाछ,
मंत्र अभिरक्षित
पुरातन सुरक्षित
पारम्परिक
परिणय के लिए
तुम
पतझड़ हो, विष हो
अभिशाप हो, कलंक हो,
पर सच तो यह है
तपती रेत सी
हमारी एषणाओं के लिए
पवित्र सात्विक
अमृत-धार हो तुम
मेरी कृष्णा !
हे मेरी मैत्रेयी !
तुमने ही तो
नवमंत्र दिया
मुझे दीक्षित किया
कि
यह देह भी सत्य है
रूह भी
और
अलौकिक खुशबू भी ।

वह हँसती है तो

रणेन्द्र

वह हँसती है तो
पलाश वन में
लग जाती है आग
धधकती लपकती लौ
अंतरिक्ष की ओर
सूर्योदय तक
लहकता रहता है क्षितिज
वह हँसती है तो
बरस जाते हैं बादल
गहरे हरे
चमचम पत्ते
बदल जाते हैं
पखेरूओं में
वनपाखियों के कलरव से
गूँजता है दिगन्त
सकुचा जाते हैं
बहेलियों के जाल

हँसी है कि

हँसी है कि
उड़ती
डोलती फिरती हैं
तितलियाँ
दंतपंक्तियों की द्युति से दमकती
श्वेत शुभ्र तितली
पुतलियों की राह
मन में
उतरती है तो
अन्तर्लोक में
होता है
सूर्योदय
टेसू फूल होठों से
उड़ती तितलियाँ
नसों में
उतरती हैं तो
तेज-तेज प्रवाह में
आता है उफान
ऊँचा उठता ज्वार
नीले आसमान के पार
जिसके मार से
बिखर जाते हैं अणु-अणु,
उड़ती है रेत
लहराते आँचल से
उड़ी तितलियाँ
मन के
हजारों हजार
द्वारों के पार अथाह थार
रेत को
भिगोंती है बारिश
खिल-खिल जाती हैं
ढेरो सूरजमुखियाँ
वह स्त्री है
कि अगरु गंध
चाँदनी या स्मृति
या स्मृति की कील पर
लटकती कोई पेन्टिंग
या दूर भटकती
विरह की धुन
वह स्त्री है
या सिर्फ हँसी

हँसी

रणेन्द्र

1 वह हँसती है
मानो स्त्री न हो
सिर्फ हँसी हो
कौंधती है हँसी,
तीखे, नुकीले, बनैले
शब्दों के सामने
दमक से
कुन्द करती है
सबकी धार
हँसी है
अनवरत झरता
झरना,
शीतल, पारदर्शी
चमकते जल के पास
ठिठक गए हैं
सियाने शिकारी,
व्यग्र ब्याध सँपेरों के पाँव
हँसी है
रिमझिम बारिश,
भींगता है जंगल
पुराने नये पेड़
सूखी हरी पत्तियाँ
शाखाएँ, तने, जड़
पशु, पंछी, कीड़े, सरीसृप
धोना चाहती है
सबके धूल
मैल
विष सारे
हँसी है
कि धैर्य,
टूटेगा तो
आयेगी बाढ़

बारिश...3

रणेन्द्र

सूर्य की परिक्रमा
करती है पृथ्वी
और पृथ्वी का
चन्द्रमा
पपीहे की टीस
चातकी की पुकार
क्रौंच का क्रन्दन
आह, दाह, आकर्षण यह
प्रकृति है
सरस-सहज प्रकृति
पर इन्द्र को
नहीं ये स्वीकार
ना कुबेर
ना दिक्पालों को
होगी
ओलों की बौछार
कतरा-कतरा बर्फ
जमेगी जमायेगी
बुझायेगी सारी आँच
चहुँओर
शीत प्रकम्पित परिवेश
ठिठुरती-ठिठुराती रात
नितान्त सूनापन
पर दूर है
शेष एक अलाव
मद्धम मद्धम धाह
निरीह कातर नेह है
महसूसना
आवाज न देना
सुन लेगा इन्द्र
सुनेंगे कुबेर
दिक्पाल भी
शीत लहरें
गला जकड़ लेगी
नीला होगा लहू
सुफेद कागज काया
मौन और दूरी की
गुजारिश और गुंजाइश
हिचकी-सिसकी नहीं
विलाप-रुदन नहीं
पलकों से ना
अन्तर्लोक में हो बारिश

बारिश...2

रणेन्द्र



नीले आसमान के दुकूल को
कमर से लपेट
बादलों की ऊनी चादर
काँधे से ओढ़ा है
शायद
थरथराहट थमे
ढँक गये हैं
सूरज-चाँद के कुंडल
प्रकम्पित है पृथ्वी
इच्छाओं की सुगन्ध
हवा में तैर रही है,
निगाहों में चमक रही हैं
बिजलियाँ
पेशानी पर स्वेद कण
दिशाएँ
मौन साधे खड़ी हैं
तय है
इसी क्षण होगी बारिश

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008



shadyntro के पास है


suwidhawo से दूर


कुछ लोग hawaao के है बंधुवा मजदुर


कुछ लोग hawaao के है बंधुवा मजदुर


हवा हवा में भी सरकार हमारी है।


घायल रहो की ये साँस बेचारी है


यही हवा अपनी भी खाते में है भरपूर


कुछ लोग हवाओं के है बंधुवा मजदुर


शडयंत्री के पास है


सुwiधाओ से दूर