बुधवार, 14 नवंबर 2018

बहुत दूर हूं आपसे (तीर्थ नाथ आकाश)

बहुत दूर हूं आपसे
पर दुआ मेरी आपके साथ है,
मैं पड़ा हूं कहीं,
पर हर फरियाद आपके साथ है,
जन्मदिन है आपका,
दुआ यह करता हूं आज
मैं रहूं ना रहूं
हर ऊंचाई आपके साथ रहे,
आकाश से भी ऊंचा
नाम हो आपका,
हमारी तो है
छोटी सी दुनिया
पर परमेश्वर चाहता है कि
सारे संसार में नाम हो आपका

रख हौसला,

रख हौसला, वो मंज़र भी आएगा
प्यासे के पास चल के, समंदर भी आयेंगा
थक कर ना बैठ, ए मंजिल के मुसाफिर
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मजा भी आएगा.

रंग तो बस रंग है (तीर्थ नाथ आकाश)

रंग तो बस रंग है
इससे क्या फर्क पड़ता है
रंग काला हो या गोरा
रंग हरा हो या लाल
रंग से ज्यादा #व्यक्तित्व मायने रखता है
मायने रखता है मन का रंग
वो सफेद है या काला
किसी का चेहरा
बस उसको पहचानने के लिए होता है
चेहरे से किसी का व्यक्तित्व नहीं झलकता.
तोड़ देंगे हम #रंग_भेद की दीवारें
तोड़ देंगे हम #जाति_भेद की दीवारें
गिरा देंगे हम #धर्म_भेद की दीवारें
डाह देंगे हम #लिंग_भेद की दीवारें

उन दिनों का वो लाल रंग( तीर्थ नाथ आकाश)

उन दिनों का वो लाल रंग
(पीरियड पर मेरी कविता)

उन दिनों का वो लाल रंग
बस लहू नहीं है
वो पहचान है स्त्री होने की
वो स्त्री जो मां है
वो स्त्री जो बहन है
वो स्त्री जो दो परिवारों का बंधन है

उन दिनों का वो लाल रंग
धर्म है उनका
अपवित्र नहीं पवित्र है
सभ्य है सुशोभित है
सुनों दोमुखी समाज हमारा
वो लाल रंग आये तो दिक्कत
ना आये तो दिक्कते दिक्कत
सुनो कोई बकवास नहीं है
यह जरूरी बात है
उन दिनों का वो लाल रंग

वो बस लाल रंग नहीं
जिस्म के हिस्से से
बहता लहू है
वो सींचता है
एक नए बीज को
मैं समझता हूं तकलीफ 
उस मासिक धर्म की
जो तुम्हे(स्त्री) को दर्द देता है
मैं हूँ एक पुरुष लेकिन
यह जानता हूं कि
मैं भी ना होता अगर ना होता
उन दिनों का वो लाल रंग.

समझता हूं तकलीफ होती है
तुम्हारा मन विचलित सा होता है
उन दिनों में तुम चिड़चिड़ा जाती हो
लेकिन मैं भी तो हूं
तुम्हे संवारने को
तुम्हारे मन के उस भटकाव 
हर बार समेटने को
तुम ये मत समझना कि
मैं नहीं समझता हूं
तुम्हारे बार बार बाते बदलने को
छोटी सी बात पर चिल्लाने को
मैं आज खुल कर यह कहता हूं
पीरियड के दिनों में
जब तुमसे बात करता हूं
बिना कारण के तेरा झगड़ना
समझ जाता हूं कि तकलीफ में हो तुम
लेकिन मैं मानता हूं कि
हमारे लिए भी जरूरी है 
उन दिनों का वो लाल रंग.

सभी महिलाओं को मेरा #लाल_सलाम...

तेरी दी हुई चादर ( तीर्थ नाथ आकाश)

तेरी दी हुई चादर
(मेरी कविता)

तेरी दी हुई वो चादर
तेरे होने का एहसास दिलाती है
तेरा मेरे माथे पर हांथ फेरना
तेरा मेरे कानों में कहना
मेरे हाथों को भरोसे से पकड़ना
हर बात याद दिलाती है 
तेरी दी हुई चादर

तेरी खुशबू है इसमें
मेरे पैरों को गुदगुदाती है
मेरे जीवन के हर कांटे को
गुलमोहर बनाती है
तू साथ है हर वक्त
तेरे स्पर्श को ताजा करती है
तेरी दी हुई चादर

मैं तुमसे दूर नहीं रह पाता
जीवन का एक पल भी
सोच नहीं पाता
तुमसे जुदा होने का सोच कर
मैं उदास हो जाता हूं
जीवन के हर संघर्ष से
लड़ कर - थक कर
जब घर आता हूं
अपने बिस्तर पर जाता हूं
तब मेरी थकान भगाती है
तेरी दी हुई चादर

सुनो ना गलती हो जाती है
मैं भी इंसान हूं
हर बार सही नहीं हो पाता हूं
जब हांथ पकड़ती हो मेरा
तो लगता है तुम ही जिंदगी हो
जब साथ चलती हो मेरे 
तो लगता है बस तुम ही हो
आगोश में तेरे खोना चाहता हूं
तुझे आगोश में रखना चाहता हूं
जब मैं कभी टूटता हूं या
बिखरने लगता हूं तो
मुझे समेट लेती है
तेरी दी हुई चादर

तेरी यादों की कविता बनाऊँ (तीर्थ नाथ आकाश)

तेरी यादों की कविता बनाऊँ
उसे फिर मैं नए शब्दों से सजाऊँ
क्या लिखूं क्या ना लिखूं
तेरे साथ गुजारा हर पल कविता
उलझे सुलझे अल्फाज सारे
तू कुछ कह दे तो कविता

मुझसे बाते करते तेरा सो जाना
तेरी सांसे का उलझ जाना
सुबह आधी नींद में
मुझसे हल्की मुस्कान से बात करना
तेरा प्यार से कैसे हो कहना
इन सब बातों में बनती है कविता

मेरी वीरान जिंदगी थी
तू आई नया एहसास आया
जो कभी ना हुआ
जो कभी ना किया
कई बार कुछ नया कर पाया
तेरे मुझे मुस्कुरा कर देखना
मेरी हांथों को भरोसे से पकड़ना
गले लग मेरी पीठ थपथपाना
फिर यह कहते हुए चले जाना
की ख्याल रखो अपना
सुनों यह भी तो है कविता

गेंदा फूल की तरह तेरी खुशबू
उड़हुल फूल सी तेज तुममे
पंक्षी सी उड़ती हो तुम
कभी यहां कभी वहां
तितली सी कई रंग है तुममे
तुझे देख मैं भी सीखता हूं
मेरी जिद को तुमने संभाला
बन एक मजबूत चट्टान तुम
मेरी मुश्किलों से टकराती हो
मेरे दुखी होने पर
हर बार तेरा कहना तुम ठीक हो
बोलो तो क्या यह नहीं है कविता

करंज कर तेल, ( तीर्थ नाथ आकाश)

करंज कर तेल कर दिया....
शांत सड़क
शांत मंजिल
शांत किनारा
शांत मैं..