बुधवार, 14 नवंबर 2018

मैं अकेला ( तीर्थ नाथ आकाश)


मैं अकेला 
लेकिन दीवाली अकेली नहीं
कितने दीप जले
कितनी जली मोमबत्तियां
सब ने दुआ की उससे
की दूर हो अंधियारा
लेकिन क्या अंधेरा दूर हुआ
नहीं कभी नहीं
खत्म नहीं हो सकता अंधियारा.
कभी मन में दीपक जलाओ
कभी मन के घर भी सजाओ
कुरीतियों को करो समाप्त
बदलों समाज का रूप
हर एक व्यक्ति रहे खुश
हर घर आये खुशहाली
मैं अकेला, जीवन भी अकेला
फिर भी सब के लिए
दुआ के साथ एक दीप जलाली
सभी को हैप्पी दीवाली.

सोंचा एक तस्वीर बनाऊँ (तीर्थ नाथ आकाश)


सोंचा एक तस्वीर बनाऊँ
लेकिन फिर याद आया कि
मेरे जीवन के सारे रंग 
कहीं खो गए.
मैं बन्द अंधेरे कमरे में
कुछ ढूंढ रहा था
कुछ खोज नहीं पाया
बस रोता रहा सिराहने तकिए के
रात गुजरती रही 
लेकिन मैं जगता रहा
सुबह के इंतजार में
तुम्हारी दी हुई चादर को
लपेट कर सोने की कोशिश में
तुम्हारी याद फिर रुला जाती है
तुम याद रखना कि 
मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूं
जंगल जैसे नदी बिन अधूरा
घड़ी की सुई टिकटोक बजती 
सुन उस आवाज को मैं
इंतजार करता हूं तुम्हारे आने का
तुम जब कहती हो कि
मेरा प्रेम झूठा है
तब मन टूट जाता है
लगता है सर पटक तेरे कदमों में
खुद को मार दुँ
जब तुम कहती हो कि
मुझसे दूर रहो 
तब मन करता है
खुद की जिंदगी खत्म कर
तेरा जीवन संवार दुं
लेकिन करूँ तो क्या
जीवन कोई धागा नहीं 
जिसे जब चाहा नोच लिया
लेकिन अब यह खत्म होगा
ना तेरे करीब रहूंगा
ना तुमको कोई तकलीफ होगा
अब मैं अपने राह चलूंगा
हर भीड़ में अकेला
बिना किसी सहारे चलूंगा
मैं तकलीफ में हूं
मेरे जीवन में
मेरे शरीर में
इतना दर्द है कि
मैं बता भी नहीं सकता
लेकिन चलो अब खत्म करों
जाओ तुम जी लो
खुश रहना तुम
मुझे मिस कर रही हो
अब मत कहना तुम
मैं चलता हूँ 
तुम्हे भूलना आसान नहीं 
लेकिन मैं मरता जीता
चलता हूँ.

जीवन कोई धागा नहीं( तीर्थ नाथ आकाश)

जीवन कोई धागा नहीं
कि नोच दिया जाय या
खत्म कर दी जाय
सांस की अंतिम डोर
अटकी है
सब रुक गया है
सब धुंध पड़ने लगा है
अब जीवन का अंतिम क्षण
ये रिस्ते नाते - पैसा कोड़ी
सब मोह माया
सत्य बस मौत है
बाते भले ही बहुत पुरानी
लेकिन यादें ताजा है आज
जैसे बात हो कल परसो की
आपके हांथों की तेल मालिस से
मजबूती से खड़ा हूं आज
बचपन से मेरे समर्थन में
पापा से लड़ना
शायद इसीलिए मैं बिगड़ा हूं
आपका मेरे दर्द पर रोना
मुझे खिलखिलाता देख
आपका भी मुस्कुराना
घर रूपी गुलक का
आप महत्वपूर्ण सिक्का हो
एक भरे पूरे परिवार
की छाया हो आप
हर बात याद आई
आपको देख कर
मन रोया
शायद कुछ पल हो आप
घर के दरवाजे पर
आपका बैठ कर रहना
कहीं से आने पर
सबसे पहले कहना
#कहां_से_आवे_हैं_बेटा
फिर मेरा चिल्ला कर कहना
#की_दिन_भयर_पूछते_रहे_हैं
मैं निःशब्द हूं
दुखी हूं यह सोचकर की
आपको ना देख पाऊंगा
लेकिन हम बस तुच्छ मानव
कर भी क्या सकते है
वक्त के कांटे को घुमा का
कुछ महीने पहले ले जाऊं
रोक दुं उस समय को वहीं
यह बस कहने की बातें हैं
संभव तो नहीं
क्या कहूं अब तो
कहना नहीं कहना सब बेकार
बस अंतिम यह कहूंगा
आपके जाने से
घर की एक पीढ़ी खत्म हो जाएगी
हम याद करेंगे आपको
लेकिन मिल नहीं पाएंगे
जहां भी जाएं आप
हमें याद रखना
मैं जानता हूं
जाने के बाद आना संभव नहीं
लेकिन अगर थोड़ी सी भी
सम्भावना हो तो
लौट आना आप
हम आपकी यादों को समेटेंगे
यह क्षण बड़ा ही दुखदायी
घर की नींव मेरी दादी
अपने अंतिम समय पर आयी
बस सांसे चल रही है
बाकी सब बन्द
अब बस अंतिम क्षण
अब बस अंतिम क्षण.
मेरी दादी की स्थिति नाजुक
बस सांस चल रही है.
सुभाष दादु, बड़ी फुआ, छुटु दादु, लखन दादु.

तन माटी (तीर्थ नाथ आकाश)

तन माटी
तन काया 
इस धरती पर
सब मेहमान
कोई पहले जाता
कोई थोड़े बाद
बस यादें रह जाती है
सब यहीं छूट जाता
जाता कुछ भी नहीं
सब जल माटी हो जाता.

मेरी दादी का देहांत हो गया.

शिबू आंदोलन का नाम है (तीर्थ नाथ आकाश)

शिबू आंदोलन का नाम है
शिबू बदलाव का नाम है
शिबू क्रांति की गाथा है
शिबू में झारखंडीयों की आस्था है
शिबू संघर्ष की निशानी है
शिबू बहता पानी है
शिबू बगावत की आवाज है
शिबू विद्रोह की साज है
Dr Nishikant Dubey तू ये भूल कभी नहीं
तू शिबू के पैरों का धूल भी नहीं
शिबू किसान का बच्चा है
शिबू लाख बुरा है
लेकिन तुझ बिहारी से अच्छा है
माटी पुत्रों की शान है शिबू
शिबू आम इंसान नहीं
झारखंडी बेटे का नाम है शिबू ।।
इसे कोई ये ना कहना कि मैं jmm से हूँ , लेकिन दिशुम गुरु है शिबू सोरेन , झारखण्ड के प्रति इनका संघर्ष अतुल्य है ....!!!!
एक बिहारी झारखंडी माटी के पुत्र को भला बुरा कैसे कह सकता है.
नहीं सुदेश के खिलाफ भी नहीं, बाबूलाल के खिलाफ भी , हेमन्त के खिलाफ भी , किसी झारखंडी जन के बारे में किसी बाहरी से नहीं सुन सकता हूँ एक लब्ज .

बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा (तीर्थ नाथ आकाश)

बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा
घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से
कहीं से भी आ मेरे बिरसा
खेतों की बयार बनकर
लोग तेरी बाट जोहते.

बिरसा मुंडा(जन्म: 15 नवंबर 1875 मृत्यु: 9 जून 1900) अमर रहे..
बिरसा का उलगुलान मात्र विद्रोह नहीं था. यह झारखंडी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था.
हालात आज भी वैसे ही हैं जैसे बिरसा मुंडा के वक्त थे. आदिवासी खदेड़े जा रहे हैं, गैर झारखंडी अब भी हैं. जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और न ही अब हैं.

माटी झारखण्ड की (तीर्थ नाथ आकाश)

माटी झारखण्ड की
गाये संघर्षों की गाथा
जलाई गई यहीं
क्रांति की मशाल

इस मिट्टी में
बिरसा तेरा लहूं बहा
लाखों क्रांतिकारियों ने
लड़ हमें अपना राज्य दिया

बिरसा ने शुरू कर लड़ाई
निर्मल को सौंप दिया
सब ने मर कर
इस माटी को आजाद किया

हवाओं में निर्मल सी खुशबू
और माटी में बिरसा का लहूं लाल
200 साल लड़ाई के बाद
झारखण्ड हुआ गुलामी से आजाद

ना हम कभी बंगाली रहे
ना रहे कभी उड़िया
ना हम थे कभी बिहारी
हम कल भी थे झारखंडी
हम आज भी हैं झारखंडी
हमेशा हम रहेंगे झारखंडी

अबुआ दिशुम - अबुआ राज
बस नारा नहीं 
यह आवाज है 
जो बिरसा ने दिया
गुलामी की हर जंजीर तोड़ 
हम लड़ेंगे स्वराज के लिए
हम लड़ेंगे हक के लिए

बिरसा की लड़ाई 
अब हम भी लड़ेंगे
ना मिला हमको हक जो
वो हम ले के रहेंगे
जमीने लूट गई हमारी
जंगल कट गए हमारे
बाहरियों ने नदियों को भी बांध दिया

युवा हुआ अब झारखण्ड
अब तीर धनुष उठायेगा 
अब ना लूटेगा झारखण्ड
हमें अब संकल्प लेना होगा
इस माटी का कर्ज चुकाना होगा
बिरसा के सपनों का 
झारखण्ड हमें बनाना होगा

स्थापना दिवस की शुभकामनाएं...