बुधवार, 14 नवंबर 2018

शिबू आंदोलन का नाम है (तीर्थ नाथ आकाश)

शिबू आंदोलन का नाम है
शिबू बदलाव का नाम है
शिबू क्रांति की गाथा है
शिबू में झारखंडीयों की आस्था है
शिबू संघर्ष की निशानी है
शिबू बहता पानी है
शिबू बगावत की आवाज है
शिबू विद्रोह की साज है
Dr Nishikant Dubey तू ये भूल कभी नहीं
तू शिबू के पैरों का धूल भी नहीं
शिबू किसान का बच्चा है
शिबू लाख बुरा है
लेकिन तुझ बिहारी से अच्छा है
माटी पुत्रों की शान है शिबू
शिबू आम इंसान नहीं
झारखंडी बेटे का नाम है शिबू ।।
इसे कोई ये ना कहना कि मैं jmm से हूँ , लेकिन दिशुम गुरु है शिबू सोरेन , झारखण्ड के प्रति इनका संघर्ष अतुल्य है ....!!!!
एक बिहारी झारखंडी माटी के पुत्र को भला बुरा कैसे कह सकता है.
नहीं सुदेश के खिलाफ भी नहीं, बाबूलाल के खिलाफ भी , हेमन्त के खिलाफ भी , किसी झारखंडी जन के बारे में किसी बाहरी से नहीं सुन सकता हूँ एक लब्ज .

बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा (तीर्थ नाथ आकाश)

बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा
घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से
कहीं से भी आ मेरे बिरसा
खेतों की बयार बनकर
लोग तेरी बाट जोहते.

बिरसा मुंडा(जन्म: 15 नवंबर 1875 मृत्यु: 9 जून 1900) अमर रहे..
बिरसा का उलगुलान मात्र विद्रोह नहीं था. यह झारखंडी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था.
हालात आज भी वैसे ही हैं जैसे बिरसा मुंडा के वक्त थे. आदिवासी खदेड़े जा रहे हैं, गैर झारखंडी अब भी हैं. जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और न ही अब हैं.

माटी झारखण्ड की (तीर्थ नाथ आकाश)

माटी झारखण्ड की
गाये संघर्षों की गाथा
जलाई गई यहीं
क्रांति की मशाल

इस मिट्टी में
बिरसा तेरा लहूं बहा
लाखों क्रांतिकारियों ने
लड़ हमें अपना राज्य दिया

बिरसा ने शुरू कर लड़ाई
निर्मल को सौंप दिया
सब ने मर कर
इस माटी को आजाद किया

हवाओं में निर्मल सी खुशबू
और माटी में बिरसा का लहूं लाल
200 साल लड़ाई के बाद
झारखण्ड हुआ गुलामी से आजाद

ना हम कभी बंगाली रहे
ना रहे कभी उड़िया
ना हम थे कभी बिहारी
हम कल भी थे झारखंडी
हम आज भी हैं झारखंडी
हमेशा हम रहेंगे झारखंडी

अबुआ दिशुम - अबुआ राज
बस नारा नहीं 
यह आवाज है 
जो बिरसा ने दिया
गुलामी की हर जंजीर तोड़ 
हम लड़ेंगे स्वराज के लिए
हम लड़ेंगे हक के लिए

बिरसा की लड़ाई 
अब हम भी लड़ेंगे
ना मिला हमको हक जो
वो हम ले के रहेंगे
जमीने लूट गई हमारी
जंगल कट गए हमारे
बाहरियों ने नदियों को भी बांध दिया

युवा हुआ अब झारखण्ड
अब तीर धनुष उठायेगा 
अब ना लूटेगा झारखण्ड
हमें अब संकल्प लेना होगा
इस माटी का कर्ज चुकाना होगा
बिरसा के सपनों का 
झारखण्ड हमें बनाना होगा

स्थापना दिवस की शुभकामनाएं...

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

फांसी टुगरी (Aloka Kujur)

फांसी टुगरी

धोडे के पैरो से उडाते धुल
टोला टोला छः छः कोस
टुगरी के ई कोह से उ कोह तक
धुल पत्ता से ढके आंगन
मौजूद है, गवाह है
चीता पच्चो की लूटती जमीन पर
गोतिया का पहरा  कब्जा ही तो था
तिलमिलाती बेटी फसल बो कर
शहर कमा आती।
नही काटा अपने फसल को
कनकनी रातों मे भी
पोवाल नही लाया घर
रात भर जलती रही 
चूल्हा चीता पच्चो के
भीतर बाहर होते लोग
बस्ती मे कोना कोना घर से
धुआ को चांदनी रात मे निहारते सब थे
कार्तिक की जाड़ा भूख के आगे कम थे।
संघर्ष टुंगरी के हर घर मे
जस का तस
किसान बेटी  के ललाट पर

दम अभी भी है कल भी था।

बेटी (aloka Kujur)

बेटी
पांच बेटी की मां
गांदूर टकटकाई पूना के बेटे निहार 
इच्छा के छन को मन की र्दद लिए
बेटे ना होने का दुख खूद को कोसती 
खेतो में हल कौन चलाएगा बोल हलका 
मन को कर लेती 
बुढापे में कमाकर कौन खिलाएगा 
अंतिम संस्कार  तक कौन होगा
जैसे सवालो से मन भरी चेहरे में उदासी के पल
हर घर से पूछते है बच्चों के हाल
“ाब्दों मे व्यर्थ और आखों नम
स्वर में उदासीता के जबाब होते
समाज के समक्ष कुछ बोलकर 
बदलाव के धुन कानों में सुनते रहे
अंदर घरों में वही निमय
जरूरत ने दामन को आजाद किया
म”ाीनी युग ने बेटी को पहचांन दी
घर की चाहत ने सम्मान पर कसक
चाहत की थी चाहत बदलाव की थी 
बदलते समाज स्वर और बढ़ते भेद ने 
कसौटी पर बेटी को जगह दिया पर आजादी छिन्न ली 
संस्कार वही मन की चाहत उसकी अकेले नहीं 
सस्ती श्रम और सेवा के आगे 
दौड लगा रही लिंग भेद के हवा
बेहतर और चाहत के बीच 
परम्पराओं के धीरे हुए आज भी है बेटी 

शाम (Aloka Kujur)

आज की शाम मेरे लिए अनोखा रहा।
किरण का सो जाना मेरे लिए सुकून रहा।
लौटती भीड मे खोया मन मेरे लिए आनमोल रहा।
मुस्कुराते चांद के साथ एक पल और रहा।
आंगन मे चांद का महकना कुछ और रहा।
ह्मदय मे हवा का एहसास कुछ और रहा।

जीवन मे हर शाम कुछ कहता रहा
दीया लिये भाभी अगली मनत को तैयार रही।
शोर इतना की मनते से बडी डीमांड हुई
शाम की चाय का नजारा ही कुछ और रहा।
पलको मे यादे थी शमा को ओर बंध रहा।
जल रही है बाती घरो मे छाया कोई ओर रहा।
पल भर की तन्हाई और खो जाता ये जमाना रहा।

शाम के इस पहरे दार से जमाने से कह रहा।
हाथो मे लिए चल रहे है मन की कौन सुन रहा।
जहाँ मे शाम एकलौता है देखो कौन इसे बांट रहा।
बादल रौशन है आज कि
 कल कुछ नाराजगी कुछ और रहा।
आज की शाम मेरे लिए अनोखा रहा।
किरण का सो जाना मेरे लिए सुकून रहा।
लौटती भीड मे खोया मन मेरे लिए आनमोल रहा।
मुस्कुराते चांद के साथ एक पल और रहा।
आंगन मे चांद का महकना कुछ और रहा।
ह्मदय मे हवा का एहसास कुछ और रहा।

जीवन मे हर शाम कुछ कहता रहा
दीया लिये भाभी अगली मनत को तैयार रही।
शोर इतना की मनते से बडी डीमांड हुई
शाम की चाय का नजारा ही कुछ और रहा।
पलको मे यादे थी शमा को ओर बंध रहा।
जल रही है बाती घरो मे छाया कोई ओर रहा।
पल भर की तन्हाई और खो जाता ये जमाना रहा।

शाम के इस पहरे दार से जमाने से कह रहा।
हाथो मे लिए चल रहे है मन की कौन सुन रहा।
जहाँ मे शाम एकलौता है देखो कौन इसे बांट रहा।
बादल रौशन है आज कि
 कल कुछ नाराजगी कुछ और रहा।