Mutha Rakesh
बहुत देर से
लहरों पर उछलती
कभी पानी उपर
कभी पानी में
होती गयी मेरी आँखें
दूर पार
कही शायद
होगी वहां भी आँखें
तभी तो
मंत्रमुग्ध
हुई जाती है
वो शाम
रात होने से पहिले
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
मुक्तिबोध
पता नहीं,कब,कौन ,कहाँ ,किस ओर मिले,
किस साँझ मिले, किस सुबह मिले !!
यह राह ज़िंदगी की ,जिससे जिस जगह मिले
है ठीक वही ,बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊँचा, ज़मीन गीली
मन जिन्हे देख कल्पना करेगा जाने क्या !!
---- मुक्तिबोध
किस साँझ मिले, किस सुबह मिले !!
यह राह ज़िंदगी की ,जिससे जिस जगह मिले
है ठीक वही ,बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊँचा, ज़मीन गीली
मन जिन्हे देख कल्पना करेगा जाने क्या !!
---- मुक्तिबोध
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
प्रिया
mirchi
त्योहार दशहरा का
उमंग आसमान पर थी।
मानों सारा संसार की ख़ुशी
प्रिया के दमन पर हो
वक्त और बाजार के बीच
नन्हीं सी प्रिया
पूजा के आनन्द के साथ
खिलौने की ओर
लग रहा था
बाजार में सजें नन्हें बच्चों के दुकान
उनके शो रूम की तरह थे।
बिक रहीं थी बंदूक
गाडि़यां, गुडिया बाजार से गायब थे
मिठाईया पंसद से
गायब हो गयी
चैमिन ने अपना धाक
प्रिया के जीवन में जमाया।
त्योहार दशहरा का
उमंग आसमान पर थी।
मानों सारा संसार की ख़ुशी
प्रिया के दमन पर हो
वक्त और बाजार के बीच
नन्हीं सी प्रिया
पूजा के आनन्द के साथ
खिलौने की ओर
लग रहा था
बाजार में सजें नन्हें बच्चों के दुकान
उनके शो रूम की तरह थे।
बिक रहीं थी बंदूक
गाडि़यां, गुडिया बाजार से गायब थे
मिठाईया पंसद से
गायब हो गयी
चैमिन ने अपना धाक
प्रिया के जीवन में जमाया।
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
फैसला
आज धुप में गर्माहट काम थी.
बहर के रस्ते पर
तेज और तेज गाड़िया चल रही थी
लोगो के चहरते पर
फैसला सुनने की चाहत
आपने काम का निपटारा का
तनाव
समय बीतने के साथ
रास्ते में हौर्न काम पद रहे थे
कई दुकानों की स्टार निचे आ रही थी
दुकानों के सामान दूर रखे जा रहे थे
एक ही समुदाय समूह में क़तर बनाये
आपने घर की और थे.
दुपहर का समय था.
फ़ोन पर सुचना
आपनो को लेने लगे थे
हर घर पर टीवी खुली हुई थी.
मेहनतकश को छोर
पूरी दुनिया टीवी के करीब था
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
हम बस्तर के आदिवासी : एक गीत
आज़ाद सक्सेना
हम बस्तर के आदिवासी
आओ तुम्हे हम गीत सुनाएं
जो बीती है हम पे
आज हम सब खुल के बताएं
जो बीती है हम पे
अरे जागो मेरे आदिवासी
ओ मेरे वन के निवासी
जब तक तुम नहीं जागोगे
अपना हक नहीं मांगोगे
कुछ भी नहीं है मिलने वाला
हम बस्तर के आदिवासी...
अरे हमारे नदी पे बांध बने हैं
पुल और मकान बने हैं
हमारे पास नहीं है रोटी
तन पे है सिर्फ लंगोटी
सारा प्रशासन डीलम डोल डिलम डोल
हम बस्तर के आदिवासी...
अरे हाकिम आया, अफसर आया
जो भी आया उसने लूटा
मुर्गा काटा, बकरा खाया
हम बस्तर के आदिवासी...
अरे पत्थर तोडा, रोड बनाया
हाकिम आया, अफसर आया
जो भी आया उसने लूटा
हम बस्तर के आदिवासी...
अरे स्कूल है पर मास्टर नहीं है
दवाखाना पर डाक्टर नहीं है
डाक्टर है तो दवाई नहीं है
मास्टर है तो पढाई नहीं है
सारा प्रशासन डीलम डोल
हम बस्तर के आदिवासी...
अरे जागो मेरे आदिवासी
ओ मेरे वन के निवासी
आज़ाद सक्सेना
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
इंतजार की शाम
मिर्ची
पुरे देश मै
अमन,शांति के पीगम
पहुची जा रही है.
एकता अत्तुता पर मजबूती बनी जा रही थी.
राजनीती पार्ट हो या धार्मिक गुरु
हर अस्थान मै एकजुट
दिखी जा रही थी
इतना प्रेम. भएइचारा
सपने में नहीं था
कभी
गुमनाम फैसले पे
मीटिंग कर रहे थे सभी
इंतजार की शाम का.
थे
पुरे देश मै
अमन,शांति के पीगम
पहुची जा रही है.
एकता अत्तुता पर मजबूती बनी जा रही थी.
राजनीती पार्ट हो या धार्मिक गुरु
हर अस्थान मै एकजुट
दिखी जा रही थी
इतना प्रेम. भएइचारा
सपने में नहीं था
कभी
गुमनाम फैसले पे
मीटिंग कर रहे थे सभी
इंतजार की शाम का.
थे
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
सागर
अंजू प्रसाद
तू सागर है.
समुद्र है.
दूर तक पानी ही पानी.
बस खारा पानी .
जो आँखों से निकलती है.
बीच सागर मे भी प्यासी.
प्यास नहीं बुझती पानी
चारों और सिर्फ पानी ही पानी.
बस खारा पानी
तू सागर है.
समुद्र है.
दूर तक पानी ही पानी.
बस खारा पानी .
जो आँखों से निकलती है.
बीच सागर मे भी प्यासी.
प्यास नहीं बुझती पानी
चारों और सिर्फ पानी ही पानी.
बस खारा पानी
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