सोमवार, 19 जुलाई 2010

ई मेल में तस्वीर

ई मेल में तस्वीर

पहले की बात और थी

हुआ करते थें

जब तुम्हारे तस्वीर दिल

रख याद करते थे

दिल से

दिल में दर्द लिए

गुजरता था वो पल सबका

हालात अपनी बदल दी

तस्वीर निकाल कर

ई मेल में रख दी।

अब

तुम्हे याद करने के लिए

जाने पड़ते है इंटरनेट कैफे


छेनी हथौडे की गिफ्तारी अलोका

छेनी हथौडे की गिफ्तारी

वो अपराध कई बार करता रहा।

.हजार बार करता रहा।

.कानून उसकी कुछ न करती।

.अपनी जुबान बंद कर

गुनहगार बनता रहा।

कई बार करता रहा।

मेरे लिखे



अलोका
मध्य में समंजित करें
“ाब्द पढ़े थे तुने

मन में उठी होगी कोई

क”ाक

बदले मे उद्ववेलित किया था

तुने वो “ाब्द

जिसके सहारे में लिखने लगी थी

प्रेरणा के कविता

उस कविता से

गुजरेगी तुम्हारी निगाहे

हर “ाब्द तुमसे लेेगा बदला

यह सोच कर कि एक पल

आएगा हमारा

दिल और दिमाग में

जब छाएगा वह प्यार

तुम भूल चुके हो तब तक

जब “ाब्दों की प्रवाह से

मैं देती रहूगी तूझे अहसास

शनिवार, 17 जुलाई 2010

चाह और विदाई (अलोका)

चाह और विदाई
कैसा संयोग कि
तुम मुझे दिखते रहें
कई बात करती रहीं
दिल न भरा था
बात का सिलसिला
बनता गया
दिल में क”ाक के साथ
एक पल के लिए
न जाने रि”ता पूरा
पर अनजान बन गया।

व्यथाः मेरी

.अलोका
इतनी व्यस्तता में
व्यथा मेरी तू न सुनता तो
और कौन सुनता
कई बार को”िा”ा की
अपने मन की बातें
तुझसे कहने को
तुम्हारी व्यस्तता ने
दिल से दिल की बात
दरकिनार कर दिया।
त्ुाझे सुनाने की चाहत लिए
विदा हो गयी
तुमसे और तुम्हारे “ाहर से

हां मैने चाहा था

02. 06.10 अलोका
. लम्बे दिनों के बाद
.चाह रहीं थी बातें करना।
.गिले ”िाकवे दूर करना
. समय और समझदारी ने
.ऐसा होने नहीं दिया।
.मेरी तमन्ना थी
एक पल कुछ बोल तो दूं।
पब्लिक और प्रेस ने
ऐसा होने नहीं दिया।
.मेरा एकलौता मन
कुछ बाते करना चाह रहा।
आपकी बेचैनी और काम ने
ऐसा होने नहीं दिया।
.दिन ढलता रहा
हम करीब थे।
पर ”िाकायत सुनने का मौका न दिया।
हां मैने चाहा था
पूरा पल आपके पास रहूं
तुमनेे मुझे छूने का मौका ही नहीं दिया।

ये लम्हा बीता मेरा

.अलोका
29.06.10

चली थी, मन में
लिए गुस्सा और प्यार दोनो
तब तक
जब तक
न देखी थी मैं तुझे
न थी मन में चाहत उस वक्त तक
.रखी थी सोच कर दिल में
.न मिलूंगी तूझसे

जाने अनजाने
. हो गयी मुलाकात
. किसी मोड़ पर
. थम गया था दिल मेरा
. कुछ देर तक
. और फिर
. मिलने की चाहत दिल को तड़पाने लगी
. वो दिन एहसास
. एक -एक पल
. मेरे लिए थम सा गया।
. बिना सोचे चल दी
. पर
. मेरी निगाहे पूरे रास्ते
. तुझे तला”ाती रही।
. आंखों की तला”ाी के साथ
. दिल बेवाक् बैचन हो गया।
. आपने साथ के साथी के रास्ते
. भी खो दिया
. मन की बैचनी को थामने
. चली गयी उस देहरी तक
. जहां एक सनाटा भरा था।
. निरा”ा निगाहे
. व
. वापसी कदम
. देहरी पार करते ही
. उसका फोन आया
. इंतजार तो कर ले-की बात कह डाला।
. मै इस इतजांत को पल पल जी रही थी।
. उनसे मिलने की तड़प बढ़ रही थी।
. नहीं पता कि उस ओर मैं खींचे
. क्यों जा रही थी?